Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 48

🔆    [जय गौर हरि]            🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-48]   ▪

📬 मईया गोपिका से पूछती है-'तू क्या देखती है?' मुझे तो कन्हैया का एक भी पदचिन्ह यहाँ नहीँ दीखा।' गोपिका क्या कहे? वह पता नहीँ, किस आशा मेँ बार-बार घूमकर पुलिन की ओर देखती है। काश !-पुलिन पर पड़े उनके पदचिन्ह वायु कहीँ रहने देती। एक भी पदचिन्ह यहाँ बचा होता।

🔅 ब्रज का बड़ा महोत्सव है किसी गोप की गाय का बच्चा देना;क्योकि गायेँ ब्रज की देवता हैँ,गोपो की सम्पत्ति हैँ,सर्वस्व हैँ। किसी गाय ने बच्चा दिया,इसका अर्थ है कि सम्पत्ति बढ़ी,देव-सेवा का अवसर बढ़ा और श्री जी आयी।

▪द्वापरान्त तक तो मनुष्य भी मर्यादा मेँ ही रहता था,पशु-पक्षी आदि मेँ प्राकृत नियमो का विपर्यय कैसे देखा जाता। गायो के पुष्पिता होने की ऋतु है शरद। फलत: उनके प्रजनन की ऋतु बसन्त और ग्रीष्म है। लाख-लाख गायेँ,अत: सम्पूर्ण बसन्त एवं ग्रीष्म मेँ प्राय: प्रत्येक गोप के यहाँ प्रतिदिन कई-कई गायो का बच्चा देना,लगा ही रहता है।

🔅मईया तो प्रारम्भ से गाय के बच्चा देने के समाचार को पाकर हर्ष से पगली होती आयी है। किसी भी गाय ने बच्चा दिया हो मईया तत्काल ही गुड़,हल्दी आदि एकत्र करने लगती है और पता नहीँ कितनी औषधियाँ डालकर गाय के लिए लपसी पकाती है,मोदक बनाती और गाय तथा उसके नवजात बच्चे का पूजन करने के लिए दौड़ी जाती है।

▪अब एक धुन और बढ़ गयी है-'कन्हैया अवश्य वही दौड़ गया होगा। वह सुनता ही नहीँ कि नवजात बच्चे को छूने से गाय सीँग लगा दे सकती है।'

🔅गोपियो मेँ कोई न कोई कह देती-'आपके कन्हैया को तो कोई गाय सीँग नहीँ हिलाती।' जब कन्हैया यहाँ पहुँच जाय तो सभी गायेँ अपने नवजात बच्चे को भी छोड़ कर उन्हेँ ही सूँघती और हुंकार करती हैँ।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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