🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-6] ▪
📬 कल हमनें आस्वादन किया कि " मईया कन्हैया के लिये दधि मन्थन करती है और फिर स्वयं ही चारो तरफ हैरान होकर सबसे पूछने लगती है। मेरा लाल कहाँ है ?? तब बछड़े,गोप तक मईया के समीप आने का साहस नही कर पाते। अब आगे.....
🔅'महर! तुम दोनों को यमुना किनारे ही छोड़ आये?'
▪मईया तो नन्द बाबा के समीप जाकर उपालम्भ देती हुई कहती है 'दाऊ साथ है तो क्या हुआ।वह भी तो बालक ही है।'
🔅कन्हैया बहुत चंचल है। दोनो को पानी मेँ खेलते रहना प्रिय है।उन्हेँ स्नान करवा के साथ लाना था।
🔅'महर! तुम भवन मे चलो।'
▪यह सब कहते नन्द बाबा को कितना कष्ट पहुँचता है कोई कैसे अनुमान करेगा? लेकिन वे पुरुष है,अपने को किसी भी प्रकार से सम्भाल लेते है!
▪अपनी इस उन्मादिनी पत्नि को भी सम्भालते हुए कहते है कि तुम्हारे दाऊ और कन्हैया सुखी है! किन्तु वे यहाँ ब्रज मेँ नहीँ है।'
🔅'कन्हैया ब्रज मेँ नहीँ है?'
▪मईया तो जैसे बहुत भूली याद स्मरण करती है।कभी तो सिर पकड़ कर बैठ जाती है और कभी मूर्छित होकर गिरने लगती है।
🔅'कन्हैया आयेगा-आयेगा ही।'
▪बाबा का मन्त्र मैया के लिए अमोध है।मईया को लगता है कि कन्हैया आज ही आने वाला है।अपने को सम्भालते हुये भवन लौट आती है।कन्हैया अभी आने वाला है,अत: मईया को बहुत कुछ करना है।
🔅इस प्रकार मईया के दिन का आरम्भ हुआ करता है और यही आरम्भ अब क्रम बन चुका है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]
🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆
No comments:
Post a Comment