🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-29] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया अनेकों बार नन्दग्राम की बालिकाओं से अनुरोध करती हैं- तुम बरसाने जाकर लाडली जू को मिल आओ। उसका समाचार पाकर ही मैं संतोष कर लूंगी। अब आगे......
🔅प्रतिवर्ष ही ऋतुराज बसन्त आता है;किन्तु कहाँ आता है?
▪ब्रज मेँ जब कन्हैया था तो बसन्त बारह महीने पैर तोड़कर बैठा ही रहता था और जब से कन्हैया गया,बसन्त को भूल ही गया कि उसे ब्रज मेँ भी आना हैँ। ब्रज मेँ तो पतझड़ जमकर बैठा है।
🔅ब्रज मेँ अद्भुत ढंग से बसन्त आता है।क्षण मेँ बसन्त, क्षण मेँ प्रचण्ड ग्रीष्म।लहराती लताएँ,झूमते तरु,गूँजती कोकिल की काकली, कब किस क्षण प्रकट हो जायगी और कब केवल निष्पत्र खेजड़ी,बबूल ही सब और दिखाई पड़ेगे कोई कह नहीँ सकता।
▪ब्रजधरा पर भी बसन्त आता है; क्योंकि प्रेम की गति ही अटपटी है।एक को मिलन स्फुरित हो रहा है तो दूसरा वियोग-दग्ध हो रहा है।
🔅 ऐसा भी होता ही है कि वृन्दादेवी-ब्रज की अधिदेवता कन्हैया का साक्षात पाकर आपाद मस्तक पुष्प सज्जा से अलंकृत हो रही हो और श्री ब्रजेश्वरी अपने गोद के धन को अपने समीप न पाकर तड़प रही हो ।
▪मईया दोनो करो से नेत्र बन्द करके बैठ जाती है और पुकारती रहती हैँ-'कन्हैया! बेटा कन्हैया! बचालो अपने लोगोँ को।
🔅सब दिशाएँ जल रहीँ हैँ। प्रफुल्ल पलाश देखकर मईया चीत्कार करती है और सबको नेत्र बन्द करने के लिए कहती है।'सब जल जाने दो-सब भस्म हो जाने दो।'।
▪उन्मादिनी मईया के मन का तो कोई ठिकाना नहीँ हैँ कि कब कैसे भाव उठ आयेँ।
🔅 मईया कन्द्रन करती हुई कहती है-हाय! हम अभागों की रक्षा के लिए मेरा सुकुमार कन्हैया अग्निपायी बना। कन्हैया को मत आने दो उसे दूर ले जाओ। किसी का कुछ बचे रहने की कोई आवश्यकता नहीँ हैँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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