Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 11

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-11]      ▪

📬 कल हमनें आस्वादन किया कि " कन्हैया को जब मोदक खाने की रूचि नहीं है, तब मोदक में कुछ न कुछ त्रुटि तो होनी चाहिए। कन्हैया मोदक को खट्टे नही बतलाता, यही क्या कम है ? अब आगे......

🔅 कोई भी सखा पूछ सकता है।'कन्हैया बाजरे की रोटी खायेगा? पालक का शाक लाया हूँ।'

▪कन्हैया हाँ भी कर सकता है और ना करना होगा तो कहेगा-'बड़े वृषभ के साथ तुम थोड़ी घास चर लो। उबले शाक से अच्छी लगेगी।'

🔅'फल ले आऊँ?' आम का नाम लो या अमरुद का।

▪कन्हैया को नहीँ खाना होगा तो हँसेगा-'तू बन्दर है? फल खाकर तो पेट बन्दर भरते हैँ।

🔅'कन्हैया! मईया ने मठरी सजायी है छीके मेँ।'

▪ दाऊ जानते हैँ कि उनके भाई को पदार्थ की भूख नहीँ लगती। पदार्थ जिसने बनाये,सजाये है,उसके ह्रदय की प्रीति की भूख कन्हैया को लगती है।

🔅लेकिन मईया यह सब नहीँ समझती और गोपियो से हँस-हँसकर कहती है--'कन्हैया के नन्हेँ से उदर मे अनेक थैलियाँ है। कोई किसी पदार्थ की-कोई किसी की। जिस समय जो खाली है,कन्हैया को फिर उसी पदार्थ की भूख लगी रहती है तब तक दूसरा कोई भी पदार्थ को मुख मेँ नहीँ डालेगा।'

▪मईया तो प्रथम पहर से ही छाक भेजना प्रारम्भ कर देती हैँ और दिन मेँ कितनी बार भेजेँगी,कुछ पता नहीँ है।

🔅'दाऊ और कन्हैया पता नहीँ किधर गायेँ ले गये होंगे।एक ही तरफ छाक भेजने से कैसे मिलेँगे।सब दिशाओँ मेँ अलग-अलग छाक जानी चाहिए।

▪मईया को यह नही समझाया जा सकता की गायो को देखकर उनके चरानेवालोँ तक पहुँचना सरल है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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