🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-33] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया अत्यन्त दुखी होकर ब्रजेश्वर के चरण पकड़ कर कहती है-मैं कब कहती हुँ देवकी उसकी मईया नहीं है लेकिन आप दो छकड़े नियुक्त करदो। सांयकाल में कन्हैया ब्रज में आ जाया करे। मैं उसे रात्रिभर पंखा सेवा करूंगी। प्रातः वह जब मथुरा जाने को कहेगा, मैं उसे कभी मना नही करूँगी। अब आगे......
🔅ब्रजेश्वर मईया यशोदा को समझाते है कि 'मथुरा मेँ कन्हैया को अर्धरात्रि तक तो राजसभा मेँ बैठना पड़ता है और प्रात: ब्रह्ममुहूर्त मेँ उठ जाना होता है। कन्हैया यदि यहाँ आयेगा तो उसे निद्रा का समय भी नहीँ मिलेगा।'
▪कोई भी यह सूचना देने का साहस नहीँ कर पाता-'जरासन्ध आने ही वाला है।' कोई नही कहता की 'मथुरा के चारो तरफ जरासन्ध की सेना के सैनिक,घोड़े,हाथी आदि के शव बिछे है। रक्त की दलदल है। चारो तरफ जलती हुई चिताओँ की अग्नि दिखाई दे रही हैँ।'
🔅यह कल्याण भी मईया के लिए असह्य है। 'हाय! मेरा लाल मुर्दो से घिरे हुए नगर मेँ है। इतनी दुर्गन्ध मेँ मेरा कन्हैया कैसे रहता होगा।'
▪ यह सुनकर मईया के प्राण तो दो क्षण नहीँ टिकेँगे। अत: कोई भी जरासन्ध के आक्रमण अथवा पराजय के बाद की स्थिति की चर्चा मईया के सम्मुख नही करता।
🔅सेवक मईया को इसी प्रकार समझाते है कि-'आपका कन्हैया कहीँ कुञ्ज मेँ यां गुफा मेँ बैठा होगा।' इस अन्धड़ मेँ और इस दोपहर कन्हैया को वहाँ से उठाकर भवन तक आने को कहना उचित नहीँ है। इस समय तो उन्हेँ वहीँ कुञ्जो मेँ रहना चाहिए
▪मईया सेवको की बातो को समझ जाती है और कहती है-तुम सब कन्हैया को देख आओ और उसे मना कर आओ कि वह छाया से धूप मेँ न आवे।'
🔅जब आँधी यां बवण्डर आता है,तो मईया सेवको को कन्हैया के पास भेजे बिना नहीँ मानती। मईया आंधी देखकर ही चिल्ला पड़ती है कहीँ यह कोई दैत्य ना हो जो मेरे कन्हैया को उठाकर उड़ न जाय।'
▪तृणावर्त का आतंक मईया के मन से अब भी गया नहीँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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