[जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-56] ▪
🔅 मईया प्रत्येक पूजा के पश्चात अपना आँचल फैलकार एक याचना करती है-'मेरा लाल सदैव सुखी रहे, स्वस्थ रहे।'
▪'गोपियों की भी यही एकमात्र वरदान चाहिये-कन्हैया प्रसन्न रहे।
🔅गोपों का ह्रदय भी यही पुकारता है। ब्रज के पशु-पक्षी,तरु-लता तक बोल सकते तो वह भी यही माँगते। भले यह विरह-दावानल मेँ स्वयं रात दिन दग्ध हो रहे हो:किन्तु इनका अणु-अणु यही पुकारता है-'उस मयूरमुकुटी तक तप्त वायु न पहुँचे।'
▪मईया बार बार प्रार्थना करती है-'हे मृत्युञ्जय! हे विश्वनाथ! आप आशुतोष हो। मैं दुखिया भाग्यहीना हूँ। कन्हैया ही मेरा सर्वस्व है। उसके रक्षा करते रहो महादेव!'
🔅'माँ अम्बिके! गणेश-जननी! आप मुझ वत्स-विरहिता-की व्यथा समझ सकती हो। हे वात्सल्यमयी! मेरे कन्हैया के मस्तक पर अपने अभय करों की छाया रखना।' मईया कण्ठ सूत्र,सिन्दूर चढ़ाती है और प्रार्थना करती रहती है।'
▪'मंगलमूर्ति गणऩ!' मईया को सबसे एक ही बात कहनी है- आप अपने सब भूत-प्रेत,योगिनी-डाकिनी,रोग-रोग-शोक भले मेरे पास भेज दो! किन्तु मेरे कन्हैया को इन सबसे दूर रखना!'
🔅भगवान गणपति कह सकते तो कहकर प्रसन्न होते--मईया ! गणेश स्वयं आशीर्वाद का आकांक्षी है।' तेरे कन्हैया के स्मरण करने वाले की छाया से मेरे सब गण दूर भागते है।'
▪देवि अम्बिका,भगवान शंकर सब मर्यादा के कारण अप्रकट और मौन रहते है--मईया की प्रार्थना को सुनकर सिर ही तो झुका सकते है। प्रकट भी हो जाए तो यह वात्सल्यमयी ब्रजेश्वरी कुछ सुनेंगी?
🔅मईया के प्राणों में एक ही पुकार बसी है। यह कहाँ कोई छोटा-बड़ा देखती है। यह तो ग्रामदेव,ग्राम-कालिका से,वृक्ष -लताओं से काक-मयूर से भी यही प्रार्थना करने लगती है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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