Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 41

🔆     [जय गौर हरि]          🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-41]    ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया थके स्वर में कहती है-मैं कब कन्हैया को खेलने में रोकती हूँ।' किन्तु वह खेल-खेलकर थक जाता है। लोगो को सर्दी में भूख लगती है किन्तु वह एक पक्षी जितना भी तो नहीँ खाता। अब आगे.....

🔅मईया कन्हैया की कोमल काली कमरिया देखते ही गोपो को पुकारती है-'कन्हैया वन मेँ अपनी कमरिया ले जाना ही भूल गया।'उसे दूँढ़कर दे आओ और दोऊ को,भद्र को भी कह आना कि अपने छोटे भाई को सायंकाल लौटते समय इसे उढ़ाकर लाये,नही तो उसे सर्दी लग जायगी।सब बालक तनिक धूप निकलते ही पटुके तक उतार फेँकते है।

▪गोपो को कहना पड़ता है 'कन्हैया वन मे नही अपने अग्रज के साथ मथुरा मेँ है,क्योकि शीतकाल मेँ जब वायु का वेग बढ़ता है,मेघ छा जाते हैँ यां वर्षा होने लगती है तब मईया की व्याकुलता बहुत अधिक बढ़ जाती है।'

🔅'कन्हैया मथुरा मेँ है।' मईया एक-एक अक्षर धीरे-धीरे बोलती है जैसे कुछ समझने का प्रयत्न कर रही हो और फिर रोने लगती है-'वहाँ देवकी उसे प्रात: यमुना स्नान मेँ कैसे रोक पाती होगी? कन्हैया तो मुख धोने के लिए भी उष्णोदक माँगते संकोच करता होगा। शीतल जल से उसके कोमल कर-चरण ठिठुरते होँगे।वहाँ तो वह किसी की गोद मेँ दुबक कर सायंकाल भी तो नहीँ बैठ पाता होगा।'

▪मथुरा मेँ ऊँचे बड़े भवनो के बारे मेँ सुनती हूँ तो वहाँ धूप काहे को मिलती होगी। मेरा लाल दिन-भर छाया मेँ रहता है?'

🔅मईया के नेत्र तो मानो सूखना ही नहीँ जानते-'उसे तो अब वन मेँ वृक्षो के नीचे धूप-छाँह मेँ खेलने का सुख भी छूट गया। मेरा नन्हा सा सुकुमार संकोची लाल राज-सभा मेँ सिकुड़ा-सिमटा बैठा रहता होगा।'

▪मईया बार-बार महर से,गोपो से पूछती है- 'मथुरा मेँ कहीँ धूप मिल सके ऐसा कोई स्थान है'? कन्हैया को कोई हाथ-धोने पर उष्णोदक देता होगा?' उसकी तो कमरिया भी यहीँ रह गयी कोई इसे ही उसके समीप भिजवा दो।'मेरा लाल ठिठुरता होगा किन्तु किसी से कुछ कहेगा भी नहीँ।'

🔅ब्रजेश्वर समझाते है-महर! 'मथुरा मेँ रत्न,कम्बलो का अभाव नहीँ है। वहाँ वासुदेव भी कन्हैया को प्राणो के समान मानते है।'

▪मईया की समझ मेँ तो यह बात नहीँ आती किन्तु वह इसे समझकर विवश बैठ जाती है कि मथुरा मेँ इस प्रकार की गोपो की कमरिया ओढ़ने से लोग कन्हैया का उपहास करेँगे इसलिए यह कमरिया अब काम नहीँ दे सकती।

🔅मईया एक दरिद्र भिक्षुक के समान याचना करती है कि-'कन्हैया को बुला लो! इस शीतकाल मेँ चार दिन यहाँ रह कर कुछ खा जाय तो तनिक पुष्ट हो जायेगा।'

▪बाबा नेत्रो मेँ अश्रु भर कर कहते हैँ-'कन्हैया आयेगा और स्वंय आयेगा।' हमारे बुलाने से उसे संकोच होगा।'

🔅मईया क्या करे? वह भी भरे नेत्रो से आकाश को घूरने लगती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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