🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-44] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया को कन्हैया का कहीं दाऊ यां भद्र के साथ बछड़े बछड़ियो की पुंछ एक साथ खिंचना,हँसता खिलखिलाता चेहरा, कभी डगमग पग डोरता यह सब मईया को प्रत्क्षय लगता है। अब आगे.....
🔅मईया को गोष्ठ मेँ जो भी सेवक या सेविका मिलती है,उनसे कहती है-'कन्हैया को ढ़ूँढ़ लाओ। वह अभी तो यहीँ था और अब नटखट मेरे हाथ नहीँ आ रहा है।
▪सेवक या सेविका अपने नेत्रो को पोछते मईया के सामने से हट जाते है क्योकी अपनी स्वामिनी का यह उन्माद उनके लिए असह्य है।
🔅मईया जब भटकते भटकते थक जाती है तो किसी एक को कहना ही पड़ता है--'आपका कन्हैया यहाँ नहीँ हैँ।वह मथुरा मेँ हैँ।'
▪'कन्हैया यहाँ नहीँ है?' मईया पूरी बात सुने बिना ही भवन मेँ लौट पड़ती है कन्हैया को ढ़ूँढ़ने और कभी पूरी बात सुनकर जड़मूर्ति के समान खड़ी रह जाती है।
🔅किसी का भी यह कहने का साहस नही होता की-श्रीकृष्ण मथुरा से भी द्वारिका चले गये। पता नही मईया समझेगी भी यां नही कि द्वारिका कितनी दूर है। इन्हेँ तो मथुरा ही सृष्टि के दूसरे छोर पर लगता है। द्वारिका समीप होता तो अब तक कन्हैया मईया के पास दौड़ आया होता।
▪मईया को प्रत्येक क्षण ऐसा लगता है-'कन्हैया अभी आने वाला है।' और सेवको,सेविकाओँ से कहती है-गोबर मत उठाओ। कन्हैया को गोबर खेलना बहुत प्रिय है। आते ही तत्काल गोष्ठ मेँ भागा आयेगा । दो क्षण यहाँ गोबर मेँ खेलेगा,तब मैँ उसे उठा ले जाऊँगी।'
🔅मईया कभी स्वयं गोबर छूकर,हाथ मेँ उठाकर देखती है और अब दूसरी ही धुन चढ़ती है-'गोष्ठ स्वच्छ कर दो झटपट गोबर उठा दो। वह आयेगा तो यहीँ गोबर मेँ बैठा रहेगा। मैँ उसे झटपट भवन मेँ मेँ ले जाना चाहती हूँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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