🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-81] ▪
🔅मईया ब्रह्ममुहूर्त से ही पुकारने लगती है--'अतिथि आते होंगे।मेरे कन्हैया का समाचार लायेँगे।उनके स्वागत की व्यवस्था करो।कोई थोड़ी दूर जाकर देख आओ कि कोई ऋषि-मुनि आ रहे हैँ? उन्हेँ आदरपूर्वक ले आओ।'
▪मईया प्राय: श्री ब्रजेश्वर से अनुरोध करती है---'तुम जाकर देखो तो सही।कोई ऋषि-मुनि किसी और के घर आये होंगे।मैँ वहीँ चली जाऊँगी। वह मेरे कन्हैया को देखकर आये होंगे।'
🔅ऐसा नहीँ है कि मईया सदा समाचार पाने को उत्सुक ही रहती हो। ऐसा बहुत कम होता है। तब होता है,जब अपेक्षाकृत स्वस्थ रहती है। तब कहीँ बादल गरज पड़े,वर्षा होने लगे तो इसे स्मरण नही रहता कि ऋतु कौन सी है? तब हाताश हो जाती-'चातुर्मास्य आ गया। अब कोई ऋषि-मुनि कन्हैया का समाचार भी देने चार महीने नहीँ आयेगा।'
▪सेविकाएँ तो इसे चातुर्मास्य मेँ भी समझा लेती हैँ--'सब ऋषि मुनि कहाँ चार महीने यात्रा स्थगित करते हैँ।कोई दो महीने एक स्थान पर रहते हैँ,कोई एक महीने। दिव्य लोकों के सिद्ध तो कभी भी आ सकते हैँ। उन्हेँ कहाँ भूमि पर चलना है कि उन्हेँ चातुर्मास्य का बन्धन है।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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