🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-38] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया जब चाहे उल्लसित होकर द्वार की और भागती है। मईया को तो प्रत्येक गन्ध अपने कन्हैयाे की अंग- गन्ध ही लगती है। लेकिन वायु का वेग बढ़ते ही उसकी व्याकुलता, आशंका भी बढ़ जाया करती है। अब आगे......
🔅विचित्र स्थिति है,शरद जैसी सुहावनी ऋतु मेँ भी मईया को चैन नहीँ आता।
▪मईया कहती है इतना स्वच्छ आकाश है,पथ-पंक भी सूख गया है। कन्हैया आज तो नहीँ आया।
🔅एक-एक दिन,एक-एक घड़ी की आतुर प्रतीक्षा,प्रतीक्षा करते प्राण,कोई कैसे इस अवस्था को समझ सकता है?
▪'मईया कहती है जब कन्हैया यहाँ था तब गोपियो के यहाँ कुछ-न-कुछ ऊधम करता ही रहता था।' और अब इस अभागिनी यशोदा को कोई किस बात का उलाहना देने आयेगी।
🔅मईया का मन मथित होता रहता है-'कन्हैया तो बहुत संकोची है। वह तो अपनो के बीच मेँ ही खुल पाता है।' वहाँ मथुरा मेँ मन मारे बैठा रहता होगा और किसी से खुलकर बोलेगा भी नहीँ।
▪शरद् मेँ मल्लिका फूलती है। गोपियो को ही नहीँ,मईया को भी बहुत प्रिय है मल्लिका-सुमन। इन उज्जवल पुष्पो की माला मईया अपने केशो मेँ लगाती थी लेकिन अब तो ब्रज मेँ कोई नववधू भी पुष्प श्रृंगार नहीँ करती।आँगन मेँ लगी मल्लिका के पुष्प झड़ते रहते हैँ।
🔅मईया लतिका के समीप जाकर सोचती है-'कन्हैया अपनी नन्हीँ अञ्जली मेँ पुष्प भर लाता और मेरे केशो मेँ उलझाने लग जाता था और कभी मेरी वेणी मेँ लगी माला से दो पुष्प निकालकर अपने केशो मेँ लगा लेता था।'
▪मईया लतिका से पूछती है-'तू अब किसके लिए इतनी पुष्पित होती है?' मैँ अब किसको आगे बैठाकर तेरे पुष्पो से उसका केश सजाऊँ?
🔅कन्हैया आता होगा? मईया कभी स्वयं पुष्प-चयन करने लगती है और कभी मल्लिका के नीचे वहीँ कोने में एकटक घूरती रहती है और अब कन्हैया चला गया तो कोई अकेला भ्रमर भी इतने सारे मादक सुरभि-भर पुष्पो पर भटककर नहीँ आता।
▪वह था तो भ्रमरो के झुण्ड उसके आसपास गूंजते मण्डराते थे।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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