🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-4] ▪
📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "मईया ने कन्हैया के सुख के लिए महर को अच्छा तो कह दिया लेकिन वह स्वयं उन्मादिनी हो चुकी थी।" आज आगे.......
🔅ब्रह्ममुहुर्त के प्रारम्भ मेँ ही मईया उठ जाती है।पता नहीँ, इसे नीँद आती भी है या नहीँ।
▪उठते ही अपनी शैय्या टटोलती है और फिर स्वयं हँसती है-'मैँ भी कैसी पगली हूँ। अब कन्हैया कोई नन्हा शिशु है कि मेरे गोद मेँ सोयेगा।वह बड़ा हो गया।अब अपने बाबा यां दाऊ के साथ सोता होगा।
🔅तनिक खीझती है मन-ही-मन-'महर को कोई कैसे समझाये कि बालकों को इतनी सुबह उठा देना आवश्यक नहीँ है।
▪वे उठ गये होंगे या उठने ही वाले होंगे।उन्हेँ तो उठते ही यमुना-किनारे भागना है। बालकों को भी उठाकर साथ ले जाये बिना नहीँ मानते।मैया को इस समय अधिक ऊहापोह करने का अवकाश नहीँ है।
🔅उनका कन्हैया यमुना-स्नान करके सीधा भागता आयेगा। उसे गौ दुहन की जल्दी रहती है।गायेँ हैँ कि हुंकारती रहेँगी; किन्तु उसके पहुँचे बिना बछड़ो को थन से मुख ही नहीँ लगाने देँगी।
▪इस दौड़ा-दौड़ी मेँ सघन नवनीत(माक्खन की लोनी) निकला रहे तो उसके मुख मेँ तनिक सा दिया जा सकता है।
क्योँकि गौ दुहन के बाद तो गोप बालक आ जायेँगेँ।
🔅सखाओँ के आने पर पर कन्हैया को स्वयं के मुख मेँ कुछ डालना सूझता ही नहीँ और सब को खिलाने मेँ लगा रहेगा। वन मेँ जाने की जल्दी पड़ेगी सबको।
▪मईया दीपक जलाती है और दधि-मन्थन प्रारम्भ कर देती है।अपना हाथ-मुख धोना भी मईया को शीघ्रता मेँ करना पड़ता है।
🔅सेविकाएँ हैँ,गोपियाँ है; किन्तु कन्हैया को तो मईया के हाथ का ही मक्खन प्रिय लगता है।
▪मईया को ही स्वयं कहाँ सन्तोष है अपने कन्हैया के लिए दधि-मन्थन किये बिना।
🔄क्रमश:
▪ [श्री राधारमणायो समर्पणम्]
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