Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 4

🔆              [जय गौर हरि]              🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-4]        ▪

📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "मईया ने कन्हैया के सुख के लिए महर को अच्छा तो कह दिया लेकिन वह स्वयं उन्मादिनी हो चुकी थी।" आज आगे.......

🔅ब्रह्ममुहुर्त के प्रारम्भ मेँ ही मईया उठ जाती है।पता नहीँ, इसे नीँद आती भी है या नहीँ।

▪उठते ही अपनी शैय्या टटोलती है और फिर स्वयं हँसती है-'मैँ भी कैसी पगली हूँ। अब कन्हैया कोई नन्हा शिशु है कि मेरे गोद मेँ सोयेगा।वह बड़ा हो गया।अब अपने बाबा यां दाऊ के साथ सोता होगा।

🔅तनिक खीझती है मन-ही-मन-'महर को कोई कैसे समझाये कि बालकों को इतनी सुबह उठा देना आवश्यक नहीँ है।

▪वे उठ गये होंगे या उठने ही वाले होंगे।उन्हेँ तो उठते ही यमुना-किनारे भागना है। बालकों को भी उठाकर साथ ले जाये बिना नहीँ मानते।मैया को इस समय अधिक ऊहापोह करने का अवकाश नहीँ है।

🔅उनका कन्हैया यमुना-स्नान करके सीधा भागता आयेगा। उसे गौ दुहन की जल्दी रहती है।गायेँ हैँ कि हुंकारती रहेँगी; किन्तु उसके पहुँचे बिना बछड़ो  को थन से मुख ही नहीँ लगाने देँगी।

▪इस दौड़ा-दौड़ी मेँ सघन नवनीत(माक्खन की लोनी) निकला रहे तो उसके मुख मेँ तनिक सा दिया जा सकता है। 
क्योँकि गौ दुहन के बाद तो गोप बालक आ जायेँगेँ।

🔅सखाओँ के आने पर पर कन्हैया को स्वयं के मुख मेँ कुछ डालना सूझता ही नहीँ और सब को खिलाने मेँ लगा रहेगा। वन मेँ जाने की जल्दी पड़ेगी सबको।

▪मईया दीपक जलाती है और दधि-मन्थन प्रारम्भ कर देती है।अपना हाथ-मुख धोना भी मईया को शीघ्रता मेँ करना पड़ता है।

🔅सेविकाएँ हैँ,गोपियाँ है; किन्तु कन्हैया को तो मईया के हाथ का ही मक्खन प्रिय लगता है।

▪मईया को ही स्वयं कहाँ सन्तोष है अपने कन्हैया के लिए दधि-मन्थन किये बिना।

🔄क्रमश:

▪ [श्री राधारमणायो समर्पणम्]

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment