Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 72

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-72]    ▪

🔅मईया के समीप इसका कोई उत्तर नहीँ कि कन्हैया मेरे भुजा या कर पर वस्त्र हटा कर नहीँ देखेगा। वह जानती है कि उनका लाल ऐसी दशा मेँ अवश्य मचलेगा वस्त्र हटाकर भुजा देखने के लिए।

▪मईया अब सेविका को अवसर देती है--'तू अब झटपट औषधीय तेल लगा दे। कन्हैया आता होगा। कोई एक द्वार पर रहो। वह आ रहा हो तो मुझे पहले संकेत कर देना।'

🔅ऐसा तो नही हैँ मईया श्रीब्रजराज से भी उलाहना नहीँ देगी।  मईया कहती है-'महर! मैँ तो हट्ट कट्टी अपहीरनी हूँ। मुझे क्या होता है?' अनेक बार उन्हेँ भी उपालम्भ देती है--'तुमने भी तो उस दिन मुझे कुछ नहीँ कहा था। तुमने पीटा क्योँ नहीँ मुझे?

▪कन्हैया कितना सुकुमार है। मैँने उसके उदर से रज्जू कसकर बाँध दी थी। उसके उदर तथा पीठ से, वह चिन्ह पता नहीँ अब भी दूर हुआ या नहीँ। कितनी पीड़ा हुई होगी उसे?'

🔅मईया अब भी उस पीड़ा का जैसे प्रत्यक्ष अनुभव करती है। 'जब वह सो जाता था तो कितने दिन मैँ उसके उदरचिह्न पर तब औषधीय तेल लगाती रहती। अब कौन उस पर तेल लगाता होगा, देवकी को पता होगा?'

▪मईया को लगता ही नहीँ उसके रज्जु-बन्धन की पीड़ा दूर हो चुकी होगी।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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