Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 30

🔆          [जय गौर हरि]          🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-30]   ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया कन्द्रन करती हुई कहती है-हाय! हम अभागों की की रक्षा के लिए मेरा सुकुमार कन्हैया अग्निपायि बना। उन्मादिनी मईया के मन का तो कोई ठिकाना नहीं है कि कब कैसे भाव उठ आयें। अब आगे.......

🔅मईया को यह भी स्मरण नहीँ रहता कि माता रोहिणी अब ब्रज मेँ नहीँ है।

▪मईया कहती है-'जीजी! मुझे अपने कन्हैया के लिए सुन्दर सा पालना सजाना है। आप मुझे थोड़े पुष्प ला दो!'

🔅मईया कोई भी तकिया गोद मेँ लेकर उसे पीताम्बर मेँ लपेट कर आंचल से ढक लेती है और जब चाहे कन्हैया को पुकारने लगती है। मईया को अभी भी अपना कन्हैया,नन्हा शिशु लगता है लेकिन तकिया मेँ उस शिशु का भ्रम ही तो होता हैँ।

▪मईया गोद के तकिये को वैसे ही पालने मेँ पौढ़ाकर, थपथपाकर,लोरी सुनाकर सब गोपियो ,सेविकाओँ से कहती है 'तुम सब पालना झुलाती रहो। मैँ इसके लिए थोड़े-से नन्हे कुसुम स्वयं चुन लाऊँ।'

🔅कन्हैया जैसे ही जाग जाय तो मुझे पुकार लेना।

▪मईया कभी कोकिला को, कभी पपीहे को आने के लिए कहती है कि कन्हैया तुम्हारा स्वर सुनकर प्रसन्न होता है और कभी आँगन मेँ दाने,फल रखती  है-अभी मेरा लाल सो रहा है।'

🔅मेरे कन्हैया! बहुत देर हो गयी तुम्हेँ सोये।

▪बहुत दारुण क्षण होता है जब मईया स्तनपान कराने को व्यग्र होती हैँ। अनेक बार गोपियाँ,सेविकाएँ बाध्य होती है यह बताने के लिए कि 'मईया! यह तो आपका तकिया ही हैँ।' लेकिन जहाँ तक विवशता ही न हो,कोई यह कहना नहीँ चाहता। सबको इसी मेँ भला लगता कि मईया भुली रहे।

🔅कुछ सेविकाएँ कहती हैँ 'मईया कन्हैया तो बड़ा हो गया है और अब वह गोचारण करने जाता हैँ।'

▪मईया को विश्वास नही होता-'यह तकिया हैँ?' मईया खुलकर हँसती हैँ-'अरे! मैँ भी कितनी पगली हूँ।'

🔅बसन्त पद-पद पर कन्हैया का स्मरण कराता है। कभी भ्रमर गुञ्जार करेँगेँ,कभी कोयल कुहुकेगी,कभी पवन सुरभि लेकर आयेगा।

▪मईया किसी भी क्षण दौड़ पड़ती है वन की ओर'कन्हैया आ रहा है।

🔅मईया को लगता हैँ कि भ्रमर,कोकिल सब उसके लाल के स्वागत मेँ ही बोलते है। पवन शीतल सुरभित कन्हैया के बिना आये ऐसा हो नही सकता।

▪ब्रजधरा का सत्य भी तो यही हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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