Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 84

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-84]  ▪

🔅 बिल्लियाँ ही नहीँ, व्याघ्रसिँह, वाराह भी मईया का चलना कठिन कर देते हैँ। इन्हेँ न डाँटा जा सकता, न डराया जा सकता। लकुट या शाटिका उठाने पर भूमि मेँ लेट जाते हैँ। ये दुर्बल, कंकालप्राय पशु-इन पर क्रोध कैसे किया जाय? यही थे कि इनका स्वस्थ, सुचिक्कन, माँस भरा शरीर दृष्टि मुग्ध करता था और अब इनकी ओर देखा नहीँ जाता है। यह जीवित है, यही कम आश्चर्य नहीँ है।

▪दधि,नवनीत तक सूँघने का भी कोई कष्ट नहीँ करता। कुत्ते होँ या बिल्ली होँ या कोई और,किसी आहार को मुख नहीँ लगाते सब। मईया अपने करों से दे तो भले कुत्ते या बिल्लियां तनिक दधि चाट लेँ, गिलहरी, मृग आदि तृण या मोदक मेँ से कुछ खा लेँ अन्यथा दूसरे के हाथ से तो यह भी इन्हेँ स्वीकार नहीँ।

🔅'कन्हैया नहीँ आया?' सायंकाल कुत्ते, बिल्लियाँ मईया के चरणों मेँ लेट-लेटकर, बोल-बोलकर इसे भूले नहीँ रहने देते।

▪'कन्हैया वन मेँ नहीँ है?' दिन मेँ ही मृग या व्याघ्र जब भवन मेँ आकर मईया के सम्मुख लेटकर नाना प्रकार-की चेष्टा करने लगेँ तो मईया अपने लाल को भूली कैसे रहे? यह पशु उससे उसके कन्हैया का दर्शन कराने का ही तो अनुरोध करते हैँ। मईया तथा गोपियों को भी अब यह बात समझने मेँ कुछ सोचना तो नहीँ रह गया है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment