Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 26

🔆          [जय गौर हरि]          🔆
▪      [उन्मादिनी यशोदा-26]   ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया गोपियों से कहती है तुम सब मुझे आशीर्वाद दो कन्हैया जहां भी रहे सुखी रहे, प्रसन्न रहे। तुम सबके आशीर्वाद से कन्हैया ब्रज में आया है। तुम सबके पुण्यों के प्रताप से कन्हैया इतने संकटो से सुरक्षित रहा। अब आगे.....

🔅 ब्रज मेँ किसी से यह आशीर्वाद माँगने की आवश्यकता हैँ? यहाँ तो अगर पशु-पक्षी,वृक्ष लता सब बोलते--कन्हैया हमारे जन्म-जन्म के सम्पूर्ण पुण्य लेकर सुखी रहेँ।

▪'कितना ऊधम करता था कन्हैया।' मईया अब उलटी बात कहती हैँ गोपियो से-तुम सबने उसे सदा क्षमा किया,सदा वात्सल्य दिया। अब भी उसी उदार वात्सल्य से आशीर्वाद दो कन्हैया सुखी रहेँ।

🔅सभी गोपियाँ इसमे एकमत हैँ-यदि कन्हैया को यहाँ आने मेँ तनिक भी संकोच होता हो,उनके किसी कार्य मेँ थोड़ी भी बाधा पड़ती हो तो उन्हेँ यहाँ नहीँ आना चाहिए।

▪हम सब कन्हैया के वियोग के दिन ऐसे ही व्यतीत करती रहेँगी।'

🔅मईया बार-बार बात दुहराकर कहती हैँ- 'कन्हैया अवश्य आयेगा।' जब  आयेगा तो तुम्हारे यहाँ गये बिना उससे रहा जायगा?

▪ कन्हैया जब तुम्हेँ देखेगा कि तुम सब दुर्बल हो गयी,तुम्हारा ग्रह असज्ज हैँ तो उसका कमल मुख से बड़े बड़े लोचन अश्रु टपकावेँगे और उदास हो जायेगा।'

🔅'यह किसी से सहा नहीँ जा सकता।' इसीलिए तो ब्रज मेँ कहीँ प्रकट वियोग का चिन्ह देखने को नहीँ मिलता।

▪सबके गृह सुसज्ज रहते हैँ। सब भोजन करते हैँ,शयन करते हैँ, अपने को सजाये रहते हैँ।

🔅कन्हैया के आने की आशा पूरे ब्रज को जीवित रखे हैँ। फिर ये तो गोपियाँ है कन्हैया के वात्सल्य की साकार प्रतिमाएँ।

▪इन सबमे मेँ ऐसी कोई गोपी नहीँ,जिसे कन्हैया 'माँ' न कहता हो।कन्हैया को तो चाची,ताई कहना मानो आता ही न हो।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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