Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 17

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-17]    ▪

📬 कल हमनें आस्वादन किया कि" मईया को सब बालक अपनें कन्हैया ही लगते हैं और इन सबको अपनी गोद में बिठाकर कुछ खिलाना चाहती है। अब आगे......

🔅कन्हैया मथुरा जा बसा है। यह तथ्य सायंकाल कैसे विस्मृत रह सकता है?

▪मईया की तो रट चलती रहती है।'दाऊ और कन्हैया आये नही कब तक खेलते रहेँगे? कोई उन्हेँ ले आओ।'

🔅 इतने मेँ कोई  न कोई सखा याँ कोई न कोई बालिका आ जाती है,उसका रुदन सुन याँ मुरझाया मुख पाकर मईया उठ खड़ी होती!उठ कर भी कन्हैया का शोक ही तो जगाता है।

▪उसी क्षण व्याकुल होकर मईया का वात्सल्य भी जाग जाता है और फूट-फूटकर रोते हुए सखाओँ को अपनी गोद मेँ समेट लेती हुई कहती है;

🔅 कन्हैया आयेगा और अवश्य आयेगा। आज नहीँ आ पाया तो क्या,कल अवश्य आयेगा !'

▪मईया अपनी इस बात से सबको आश्वासन देती है 'कन्हैया कल अवश्य आयेगा।' कल-कल ---मईया कदाचित कल्पान्त तक इस कल की ऐसे ही प्रतीक्षा कर सकती है।

🔅मईया का ह्रदय तो पहले दिन ही फट गया होता; किन्तु कन्हैया कल आयेगा और अगर उसकी मईया ब्रज मेँ ना मिली,तो क्या दशा होगी?

▪कन्हैया हिचक-हिचक रोयेगा इसलिए मईया तो कन्हैया की प्रतीक्षा कर रही है।

🔅मईया सब सखाओँ को अपने गोद मेँ लेकर शैया पर थपकी देकर सुलाने का यत्न करती है।'कन्हैया कल अवश्य आयेगा'!

▪अपने इसी शक को बार-बार दुहराती हुई मईया की पलकेँ बन्द हो जाती हैँ।

"विस्मृति ही तो मईया का जीवन बन गयी है।"

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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