Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 50

🔆     [जय गौर हरि]           🔆

▪     [उन्मादिनी यशोदा-50]    ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया चाहती है कि अपने गोष्ठ की सभी गायें बच्चा देते समय कन्हैया के द्वारा दान करा दी जायें। ब्रजेश्वर के नेत्रों से अश्रु टपकने लगते है और कहते है 'महर! तुम्हारा कन्हैया यहाँ होता तो मैं स्वयं यही करता। अब आगे.....

🔅 मईया का यह सुनते ही शरीर पलभर मेँ रक्तहीन हो उठता है-'कन्हैया नहीँ है?'

▪बाबा सम्हाल न लेँ तो यह कटे वृक्ष की भाँति गिर ही पड़े।
बाबा के समीप यही तो आधार है जीवन का -'कन्हैया अवश्य आयेगा' और अपने पास गायो का कहाँ अभाव है। उसके हाथ से तुम जितनी कहोगी,उतनी गायो का दान करा दूँगा-द्विमुखी गायो का दान।'

🔅मईया कातर कण्ठ मेँ कहती है-'महर! तुम्हीँ अब इस द्विमुखी गाय का दान कर दो। 'अब किसके लिए गोदोहन करोगे? किसके लिए मैँ दूध गरम करुँगी? किसके लिए दही जमाऊँगी? किसके लिए दधि-मन्थन करके नवनीत निकालूँगी और हमेँ अब गाय का करना भी क्या है?' मैने पहिले जन्मो मेँ बहुत पाप किये होगे। कन्हैया जैसा पुत्र गोद मेँ आया और फिर भी मैँ वन्ध्या ही रह गयी!

▪मईया ब्रजेश्वर के चरण पकड़ लेती है-'तुम्हारे इन चरणो की किँकरी हूँ। तुम द्विमुखी गौ का दान करोगे तो इस अधमा के भी कुछ पाप नष्ट हो जायेँगे। मेरा कन्हैया सुखी रहेगा।'

🔅'कन्हैया सुखी रहेगा।'इससे बड़ी अभिलाषा तो ब्रज मेँ कोई किसी की नहीँ हैँ। सब गोप भी अपनी सब गायो-का जब वे बच्चा देने लगती हैँ,दान कर देना चाहते हैँ। बाबा भला इसमेँ कार्पण्य कर सकते है? किन्तु कठिनाई यह है कि महर्षि शाण्डिल्य तथा दूसरे भी ब्राह्मण इन दिनों  गोदान लेने को ही प्रस्तुत नहीँ है। उनका भी हठ है--'हम गोदान तो अब कन्हैया के ही हाथो से लेँगे।

▪महर्षि के समीप भी मईया
को समझाने का यही एक उपाय है-'आपका कन्हैया आकर इस गौ का दूध पियेँगे और इस पद्यगन्धा का दधि-माखन आरोगेँगे।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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