Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 69

🔆            [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-69]    ▪

🔅मईया छीकों से उतारकर कभी लोँदे फेँकती है,कभी मटके पटकती हुई कहती है--इसी माखन के पीछे मैँने कन्हैया को बाँध दिया था। वह बन्दरों को माखन ही तो बाँट रहा था। यह पुण्य भी उसका मुक्त कृपण से देखा नहीँ गया।

▪'वह सुकुमार भय-विह्वल भागता फिरा और मैँ उसे साटी लिये दौड़ाती रहती। मईया के दुख की सीमा नहीँ है--'वह रुदन कर रहा था और उसके पद्यदल विशाल लोचनों से बड़े-बड़े अश्रु बिन्दु कपोलों को अञ्जन कलुषित करते रहते; किन्तु मुझ पाषाणी को दया नहीँ आयी। मैँ उस नन्हे से सुकुमार को व्याघ्री के समान गुर्राती रही। फट नहीँ गया मेरा वज्र ह्रदय।'

🔅बन्दर तक मुझ से डर गये। अब भी मुझे देखते ही दूर भाग जाते हैँ। कन्हैया कितना डर गया होगा?'

▪ मईया का अन्तस्ताप अश्र तक शुष्क कर देता है--'अब तुझ पिशाची के हाथ से छुआ माखन कोई बन्दर कैसे खायेगा। सुना है बन्दरों को विष की गन्ध आती है। तेरे तो स्पर्श मेँ ही क्रूरता, कृपणता, क्रोध की पता नहीं कितनी गन्ध होगी।'

🔅गोपियाँ समझाती है--'मईया आप व्यर्थ दुख करती हैँ। आपका कन्हैया तो उस दिन भी ऊखल से छूटने पर आपकी गोद मेँ दौड़ आया था। यह बन्दर तो बालकों के मित्र हैं। बालक नहीँ खाते, अत:यह भी माखन नही खाते। किसी भी घर मेँ भी तो नहीँ खाते।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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