Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 3

🔆        【जय गौर हरि】      🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-3]    ▪

📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "ब्रजराज जी के बताने पर कन्हैया जिनका है उन्हीं के समीप रहेगा। मईया चितकार कर उठी की मेरे लाल को छोड़कर ब्रज कैसे आ गये ? मेरा कन्हैया मुझे ला दो!" आज आगे.......

🔅जिस परम सती ने अपना पूरा जीवन, पति के संकेत का भी प्राणों से भी अधिक पालन किया था,अपने पति की उपेक्षा जिसे स्वप्न मेँ भी सम्भव नहीँ थी, उसके मुख से ऐसे कठोर शब्द निकल पाते क्या! यदि वह उन्मादिनी न हो गयी होती?

▪'महर! महर! मेरी एक बात सुन लो।'

🔅सहसा ब्रजराज (नन्द बाबा) मेँ चेतना आ गयी। चौँक कर पत्नि को मूर्छित होकर गिरने से सँभाला उन्होँने।

▪'क्या?' मेरा कन्हैया आ रहा है?' मईया ने नेत्र खोले।

🔅'तुम्हारा कन्हैया आयेगा ही।'

▪ब्रजराज (नन्द बाबा) ने कातर स्वर मेँ कहा- 'मथुरा मेँ सुनेगा कि मेरे वियोग मेँ मेरे बाबा और मईया का ह्रदय फट गया,वे मर गये तो सिर धुन-धुनकर रोवेगा।'

🔅'नहीँ! नहीँ! महर नहीँ।' मईया ने हाथ रख दिया बाबा के मुखपर-'मत कहो! यह सब मत कहो।

▪उसके कमल लोचनों मेँ अश्रु आये, यह असह्य है मुझे।'

🔅'यहीँ असह्य होने से नन्द नहीँ मर सका और यहाँ लौट आया है।

▪बाबा ने कहा-तुम्हेँ भी जीवित रहना है इसीलिए। वह सुखी रहे, प्रसन्न रहे। हम रोते हैं, यह सुनकर भी दुखी न हो, यह करना है हमेँ महर।'

🔅'अच्छा महर! मईया ने कह तो दिया, किन्तु वह उन्मादिनी हो चुकी थी। उसका वह स्नेहोन्मद न होता, सचमुच यह अपने कन्हैया से वियुक्त जीवित रह पाती?

🔄क्रमश:

   ▪🔆▪🔅🔅▪🔆▪

No comments:

Post a Comment