Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 89

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-89]  ▪

🔅वियोग सभी को बहुत संवेदनशील बना देता है। मईया तो है ही भावनामयी। यह तो नीलकण्ठ,श्वेतचील देखते ही पता नहीँ क्या-क्या सोचने लगती है।

▪मईया को अब काक बहुत प्रिय हो गये हैँ। कोई काक आँगन मेँ आ बैठे तो यह उसके लिए तत्काल रोटी,दही ले आती।पता नहीँ कब किसने काक बोली से शकुन देखने की प्रथा प्रचलित की;किन्तु दूरस्थ प्रियजन के मिलन को आसन्न सूचना काक बोलकर देता है,यह मान्यता बहुत प्राचीन है। गाँवो के लोगो का जीवन ऐसी असंख्य मान्यताओं को लेकर चलता है। ब्रज मेँ सरल विश्वासी लोग है। मईया विश्वास की मूर्ति है। अत: काक को देखकर इसमेँ आशा,उमंग जागती है और कहती है--'काक! तुम भले आये। मेरा कन्हैया आ रहा है?' मईया जागती ही रहती है,क्योकि काक तो दिनभर आँगन मेँ आते रहते हैँ।

🔅मईया अनुरोध करती है-'तनिक उड़कर बैठो तो सही! मेरा लाल चल पड़ा है?' ऐसे अनुरोध करती है,जैसे काक इनकी बात समझता है।

▪मईया काक को पता नहीँ कितने प्रलोभन देती है--'तुम बहुत अच्छे हो। मैँ प्रतिदिन तुम्हेँ दूध-भात खिलाया करुँगी। तुम्हारी चोँच से मढ़वा दूँगी। तुम्हारे पैरो मेँ रत्ननूपुर पहिनाऊँगी। मेरा कन्हैया कब आयेगा कुछ बताओ तो!'

🔅भवन मेँ जो गोपियाँ,सेविकाएँ होगी, मईया सबको बुलाती और कहती--'आज काक पता नहीँ कितने प्रकार के शब्द कर रहा है। श्री ब्रजेश्वर तक को बुलाने भेजती--सुनो तो सही,यह क्या कह रहा है? मेरा कन्हैया सुखी और प्रसन्न है?'

▪मईया नहीँ समझती कि काक शावक कुछ भिन्न प्रकार का शब्द भी माता-पिता को पुकारने के लिए करते है। यदि खाद्य सामग्री हो तो कौए अपने वर्ग को पुकार पुकारकर बुलाते हैँ। लेकिन मईया यह सब कहाँ सुनती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment