Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 66

🔆          [जय गौर हरि]           🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-66]    ▪

🔅मईया कभी तो उत्साह मेँ स्वयं दधिमन्थन करती है और कभी सेविकाओं का दधि-मन्थन भी इन्हेँ असह्य हो जाता है--'विलोड़ने की क्या आवश्यकता है? तुम सब क्योँ इतना श्रम करती हो? ऐसे ही दे दो इसे कुत्तों , बिल्लियों और कपियोँ को।' किसके लिए माखन निकालना है?अब कौन नवनीत-भोजी यहाँ बैठा है!'

▪सेविकाएँ भी तो इसी आशा पर सुबह कार्य व्यस्त होने का उत्साह अपने मेँ पाती हैं-आपका कन्हैया आयेगा?'

🔅मईया उत्सुक होकर पूछती है-'वह आज आयेगा? तुमसे किसने कहा? तुमने कहाँ सुना?'

▪'वह आयेगा ही।' सेविका और क्या कह सकती है? ब्रज मेँ सभी तो यही कहते हैं , मानते हैं और इसी आशा पर जीवित हैँ।

🔅'वह कितना दधि-माखन खा लेगा।' मईया का तो कुछ ठिकाना नहीँ है। कभी तो स्वयं पद्यगन्धा गौ के दुग्ध का दधि मन्थन करने लगती--'उसके लिए मैँ माखन निकालूँगी! और कभी सेविकाओं को भी मन्थन नहीँ करने देती--मेरे गोष्ठ मेँ गायों का अभाव है? वह आयेगा तो दधि-माखन कम मिलेगा। बाँट दो! फेँक दो! नहीँ चाहिए मुझे नवनीत। कृपण मत बनो। जो पशु-पक्षी चाहते हैं सबको दधि खाने दो।'

▪'इसी दधि के लिए मैँने अपने लाल को बाँध दिया था!' मईया कब आवेश मेँ भाण्ड उठाकर आँगन मेँ पटक देगी,कोई कह नहीँ सकता--'यह अभागे दधि-भाण्ड! कन्हैया ने एक भाण्ड फोड़ दिया तो मेरे सिर भूत चढ़ बैटा था। मैँ साटिका लेकर उसके पीछे दौड़ी थी।'

🔅सेविका स्तब्ध हो जाती और चुपचाप भवन के भाण्ड छिपाने लगती है। ऐसे आवेश के समय ब्रजेश्वरी को सम्हालना बहुत कठिन होता है।

▪मईया को रोष किसी क्षण अपने करों पर उतर जाता है। 'ये कर! इनसे मैँने अपने कन्हैया पर साटिका उठायी। 'मैँ इन्हें भस्म बना डालूँगी।'

🔅पकड़ने वाली सेविका हो या गोपी मईया किसी की सुनना नहीँ चाहती--'मुझे मत रोक!'  तू इन करों का स्पर्श मत कर! इनको छूकर तू भी अपवित्र हो जायेगी।'

▪दासियाँ दौड़कर श्रीब्रजराज को समाचार देती है। वही ऐसे आवेश में अपनी अर्धांगिनी को सम्हाल पाते हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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