Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 92

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-92]  ▪

🔅शीतकाल मेँ भी मईया को अपने शरीर की सुधि नहीँ रहती। स्नान करते कभी मूर्ति की भाँति स्थिर खड़ी रहती और कभी व्याकुल होकर इधर-उधर देखती रहती। सेविकाएँ सम्हाल कर न निकालेँ तो मईया जल मेँ ही खड़ी रहती और स्नान करना है, यह स्मरण मेँ नहीँ रहता।

▪मईया अनेक बार हाथ जोड़कर अञ्चल फैलाकर प्रार्थना करने लगती है--'आप सूर्य-तनूजा हो। मैँ वत्सहीना गौ जैसी हो गयी हूँ। मेरा कन्हैया मुझसे खो गया। वह भले दूर चला गया: किन्तु वहाँ सुखी रहे,प्रसन्न रहे।'

🔅कोई गोपी यह कह भी दे --'कन्हैया लौट आये' तो मईया शीघ्रता से घूमकर उसकी ओर देखती और कहती--वह तो आयेगा ही; किन्तु कोई संकोच उठाकर, कुछ भी हानि करके क्योँ आये? देवता उसके मन पर दबाव डाले--यह तू क्योँ चाहती है?

▪यमुना प्रत्यक्ष होकर बोल पाती तो मईया के चरण पकड़कर यही तो कहती--'माँ! मैँ तो तुम्हारे पुत्र के चरणों की सेविका हूँ। तुम्हारे चरणों का स्पर्श मिलता है, यही मेरा सौभाग्य है , तुम्हारी चरण रज के प्रसाद से उनकी प्रीति पाने की स्वयं आशा करती हूँ। कोई देवता नहीँ जो तुम्हारे लाल को प्रभावित करने की बात सोच सके। सब उनकी कृपा के ही याचक हैँ।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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