Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 88

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-88]  ▪

🔅पक्षी अपना सिर पंखो मेँ छिपाकर बैठते है तो मईया उनसे पूछती है-'कन्हैया ने तुम्हेँ खिझा दिया है? मेरे लाल से रुठकर आये हो।' वह तो चपल है। अपने सखाओँ से भी झगड़ लेता है;किन्तु किसी सखा का रुठना तो सह नहीँ सकता। तुम चले आये,वह तुम्हेँ अवश्य ढ़ूँढता होगा। मेरे लाल से रुठो मत। मैँ तुम्हेँ अभी खिलाती हूँ।' उसे आशीर्वाद देना।

▪मईया पक्षियो को कहती हैँ--तुम्हारे तो पंख हैँ। तुम कन्हैया के पास उड़कर जा सकते हो। नगर मेँ उसके पास न भी उतर सको तो उसे दूर से देख सकते हो।'

🔅मईया बहुधा दुख-कातर हो उठती है--'तुम पर विधाता का अनुग्रह है। मुझे देखो कि मैँ कितनी विवशा हूँ। मुझ पंखहीना दुखिया को कोई मेरे कन्हैया के समीप पहुँचाता नहीँ है। मैँ उसका कमल-मुख देखे बिना ऐसे ही घुट-घुटकर मर जाऊँगी।'

▪मईया बहुत शीघ्र हड़बड़ा उठती है--'नही,यह सब उससे मत कहना। वह बहुत सुकुमार है। बड़ा कोमल ह्रदय है उसका। बहुत शीघ्र उसके कोमल-लोचनो से अश्रु गिरने लगते हैँ। उसे ऐसा कुछ मत कहना जिससे वह दुखी हो। मेरा क्या है,मेरे दिन किसी प्रकार बीत ही जा रहे हैँ।

🔅मईया कभी तो सुध-बुध भूली रहती है। अपने तकिये को थपकाना छोड़कर आँगन मेँ आती और कहती है--'वह अभी सो रहा है अभी-अभी सोया है।' तुम सब बहकाना पुकारना मत। मैँ तुम सबको चारा-चुग्गा डालती हूँ। चुपचाप खाओ। हाँ,मेरे पास बैठो,पर कन्हैया को जगाओ मत।'

▪सेविकाओँ का पशुओँ के समान पक्षियो के प्रति आक्रोश नहीँ है। इनको भी लगता है कि पक्षी कन्हैया के समीप होकर आते हैँ। मईया को यह आश्वासन देते हैँ।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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