Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 86

🔆          [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-86]  ▪

🔅विहंग मयूर भी है भले वह बहुत कम उड़ पाता हो। ब्रज मेँ तो मयूरो ने गोपियों के आँगनो  मेँ घूमते रहना,नाचते रहना अपना स्वभाव बना लिया है। लेकिन नन्द बाबा का आँगन तो इतने पक्षियो से भरा रहता है कि उनकी जाति पहिचानना कठिन है।

▪कन्हैया सूतिका गृह से बाहर आया और पक्षियो का आकर्षण केन्द्र हो गया। पक्षी उसके पालने पर बैठे रहते थे और उड़ाने पर भी वहीँ फुर्र-फुर्र उड़ते रहते थे। वह घुटनेँ सरकने लगा तब से तो पक्षियो  का समूह सचमुच पक्षी--कन्हैया का पक्षपाती हो गया। अपनी भाषा मेँ उससे पता नहीँ क्या कहते रहते और उसके आसपास ही फुदकते रहते थे।

🔅अब कन्हैया ब्रज मेँ नहीँ है तो भी पक्षियो का समूह ब्रजराज का आँगन नहीँ छोड़ता है। उलटे इनकी संख्या बढ़ ही गयी है। पता नहीँ यह अब किस आशा मेँ यहीँ मंडराते रहते हैँ।

▪मईया पक्षियो को दाने डालती है।आँगन मेँ फल रखती है। पक्षी कितने ढीठ हो गये हैँ कि जब चाहे तब मईया के कन्धोँ पर बैठ जाते है। यदि यह बैठी मिल जाय तब मयूर ही नहीँ हंस भी इसकी गोद मेँ बैठकर सो जाना चाहते है।

🔅'तुम कन्हैया के समीप से आये हो?' मईया को लगता है कि पक्षी इसके लाल से मिलकर ही आते हैँ।मईया ने सुन रखा है कि हंस सन्देश-वाहक बना करते है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment