🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-85] ▪
🔅 गोपियाँ पशुओँ पर खीझती हैँ-'यह ब्रजेश्वरी को तनिक भूले भी नहीँ रहने देते।'
▪मईया बैठकर पशुओँ पर हाथ फिराते-फिराते स्वयं कन्द्रन करने लगती है--'मैँ उसे कहाँ से लाऊँ? वह ब्रज मेँ है ही कहाँ।'
🔅'कन्हैया आयेगा-अवश्य आयेगा।' महर कहते है कि वह आयेगा। वह झूठ तो बोलते ही नहीँ। कभी ऐसे आश्वासन देती है,थपकाती सहलाती है,जैसे यह पशु भी बालक यां बालिका हो और उसकी बात समझते हो।
▪'तुम सब इतने दुर्बल हो। तुम्हेँ देखकर कन्हैया दुखी हो जायगा। मईया इनको कुछ-न-कुछ खिलाने का प्रयत्न करती है-'वह तो तुमसे स्नेह करता है। तुम्हारे साथ खेलता है। तुम दुर्बल रहोगे तो तुम्हेँ देखकर स्वयं रो पड़ेगा। कुछ नही खाओगे तो उसके साथ कैसे खेल सकोगे?'
🔅मईया में वात्सल्य अनन्त है। इस वियोग की विषम पीड़ा मेँ भी इसका वात्सल्य असीम हैँ। यह किसी प्राणी को दुखी नहीँ देख पाती।दधि, दूध, नवनीत, मोदक पता नहीँ क्या-क्या उठाकर लाती रहेगी और प्रयत्न करेगी कि प्रत्येक पशु कुछ खाय।
▪मईया को यह भी स्मरण नहीँ रहता है कि बिल्ली याँ व्याघ्र तृण नहीँ खा सकते अथवा मृग,शशक दूध नहीँ पीते। यह तो गोपियो को, सेविकाओँ को समझाते, बतलाते रहना है मईया को।
🔅मईया के करो से दिया दधि याँ नवनीत मृग भी तनिक चाट ही लेते हैँ। व्याघ्र-केहरी भी मोदक या रोटी खा लेते हैँ। मईया के वात्सल्य ने ही इन सबको जीवित रखा है;किन्तु सेविकाएँ सन्तुष्ट नहीँ इन पशुओँ से--'यह स्वामिनी को तनिक तो भूले रहने देते!'किन्तु यह अबोध मूक पशु--इन पर क्रोध कैसे किया जा सकता हैँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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