Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 35

🔆          [जय गौर हरि]          🔆
▪      [उन्मादिनी यशोदा35-]  ▪

📬 कल हमने पढ़ा की "वर्षा की झड़ी जब लगती है तो मेघ दिन-रात बराबर बरसते है। ऐसी वर्षा में तो गाय भैंस की भाँति पानी में नेत्रों तक मुख डुबोकर नही चर सकती। मईया बेचैन होती है और कहती है महर ऐसे दिनों में भी बालकों को नही रोकते हैं। अब आगे.....

🔅वर्षा जब बहुत वेग की हो तो मईया अत्यन्त व्याकुल होकर कहने लगती है-'पता नहीँ कन्हैया कहाँ होगा।'

▪गोपियो को ऐसी अवस्था मेँ मईया को स्मरण दिलाना पड़ता है -'ब्रज के जीवनाधार तो मथुरा मेँ है।'

🔅मईया फटे-फटे नेत्रो से आकाश को घूरने लगती है-'बरसो खूब बरसो और अपनी मर्जी की करलो। अब यहाँ कौन बैठा है जो गिरिजाज को उठाकर ब्रज को बचा लेगा। अपनी पिछली सब कोर-कसर पूरी कर लो।' चाहो तो सबको बहा दो।

▪मईया का तो कुछ ठिकाना नहीँ है कि कब गृह की सामग्री को आँगन मेँ फेँकने लगे याँ स्वयं बाहर निकल कर कहने लगे लो मुझे मार दो ब्रज गिराकर। मुझे बहा दो।'

🔅सेविकाएँ अश्रु-भरे दृग से मईया को सम्हालते हुए कहती है--ब्रजेश्वरी! आपका मयूरमुकुटी कन्हैया आयेँगा-अवश्य ही आयेगा। यदि आपको इस अवस्था मेँ देखेगा तो बहुत दुखी होगा।'

▪मईया पूछने लगती है कन्हैया आयेगा? वह आ रहा है?

🔅मईया को लगता है कि कन्हैया अभी इसी क्षण आ खड़ा होगा।मईया झटपट भीतर भागती है और अपने गीले वस्त्र बदलती है। इधर उधर अस्त-व्यस्त वस्तुएँ ठीक करने मेँ लग जाती है।

▪मईया को लगता कन्हैया आज भी दौड़ा आयेगा और गिरीराज को उठाकर सबको इसके नीचे तत्काल चलने को कहेगा।

🔅मईया बीच मेँ ही थकित होकर धम से बैठ जाती है-'हाय! कन्हैया इतना भारी पर्वत कैसे उठा पायेगा। मईया दोनोँ हाथो की मुठ्ठी बंद करके निश्चय करती है-चाहे सब भवन गिर जाये,सामग्री बह जाय इसके लिए कन्हैया को इतना श्रम नहीँ करने दूँगी।

▪बिजली कड़कते ही मईया मुख ऊपर उठाकर डांटती है-  'बहुत धृष्ट हो गये हो? तुम्हारी घुड़की से मैँ अपने कन्हैया को पर्वत नहीँ उठाने दे सकती।'

🔅मईया सब सेवको से कहती है द्वार बन्द कर दो! तुम सब द्वार के समीप खड़े रहो। कन्हैया को भवन से बाहर मत जाने देना।

▪मईया को स्मरण मेँ नहीँ रहता कि कन्हैया भवन मेँ नहीँ हैँ।

🔅मईया एक से दूसरे कक्ष मेँ दौड़नेलगती है।'कहा गया कन्हैया?' तुम सबने उसे निकलने क्यो दिया? 'अब कन्हैया वर्षा मेँ भीगता हुआ गिरिराज उठाने जा रहा होगा।'

▪सेविकाएँ दुखी मन से मईया को स्मरण कराती है कन्हैया तो मथुरा मेँ हैँ।

🔅मईया कहती है अच्छा है मथुरा मेँ है। नगर के भवन भी दृढ़ होते होगे। कन्हैया वहाँ वर्षा मेँ सुख से होगा।' मईया को यह भावना बहुत सन्तुष्ट करती है कि उनका लाल सुख से होगा।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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