Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 9

🔆            [जय गौर हरि]            🔆
▪        [उन्मादिनी यशोदा-9]      ▪

कल हमनें आस्वादन किया कि "मईया कहती है कन्हैया दूध पिता कहाँ है। वह तो गाय के थनों को मुख लगाकर मुस्कराता है और खेलता है। अब आगे........

🔅मईया को तो प्रभात मेँ बड़ी उलझन होती है।उन्हेँ लगता है कि उसका नटखट कन्हैया भवन मेँ आये बिना बाबा के समीप से ही वन मेँ भाग जाएगा और अब तो सायंकाल लौटेगा।

▪मईया किस पर खीझे?

🔅नन्दबाबा उसे रोक नहीँ पाते।ब्रज के बालको को भी कन्हैया के समीप पहुँचे बिना चैन नहीँ।

▪अभी अँधेरा ही रहता है तभी से गायेँ हुँकार करने लगती हैँ। गोदोहन होने के पश्चात वे अपने बछड़ो को पिलाने के लिए भी रुकना नहीँ चाहती।

🔅कन्हैया तो गोपाल है,गायेँ पुकारेँगी तो कन्हैया भी रह नही पाता।

▪मईया प्रभात मेँ बहुत व्यस्त रहती है। स्वयं स्नान करके भगवान नारायण की पूजा करनी है।अपने कन्हैया के लिए कलेऊ प्रस्तुत करना है।

🔅दोपहर की छाक तो जब जायेगी,तब जायेगी; किन्तु कलेऊ किये बिना दाऊ-कन्हैया चले गये है वन मेँ।

▪दूसरे के बनाये,सजाये कलेऊ से मईया को सन्तोष होगा?

🔅'कन्हैया को पता नहीँ कैसे मेरे हाथ की गन्ध आती है।'

▪मईया ठीक ही तो कहती है दूसरा कोई कितनी भी सावधानी से,स्नेह से कलेऊ सजा दे,कन्हैया सदा देखते ही कह देता था--'यह मईया ने नहीँ रखा है।'

🔅सुबह का समय तो मईया को,गोपियो को यह कलेऊ की प्रस्तुति मेँ व्यस्त रखता है।

▪सबको यही लगता है कि कन्हैया बालको के साथ वन मेँ है। सभी गोप भी इसी अनुभूति के कारण अपने कार्यो मेँ व्यस्त बने रहते हैँ। 

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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