🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-27] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "कन्हैया के आने की आशा पुरे ब्रज को जीवित रखें है। ऐसी कोई गोपी नही, जिसे कन्हैया 'माँ' न कहता हो। मानो जैसे कन्हैया को ताई, चाची कहना आता ही न हो। अब आगे........
🔅बरसाने की और नन्दगाँव की बालिकाएँ भी कन्हैया को अपना सर्वस्व देकर हमेशा के लिए उसी की हो चुकीँ हैँ।
▪कुछ बालिकाएँ तो कन्हैया को अपना भईया कहती हैँ।
🔅सब बालिकाएँ कन्हैया को कुछ भी मानती हो,लेकिन जब आती है तो मईया के समीप एक ही आग्रह लेकर आती है-हम सबसे श्री वृषभानु लाडली की दशा देखी नहीँ जाती।आप उन्हेँ कुछ दिनो के लिए अपने पास बुला लो।आपके पास आकर कदाचित उन्हेँ कुछ शान्ति मिले।'
▪किसी भी बालिका को अपनी चिन्ता नहीँ है;लेकिन सबको लाडली जी की ही चिन्ता सताये रहती है।
🔅 मईया तो मानो पगली हो रही है। जब भी कोई बालिका आती है मईया तो उसी को गोद मेँ बैठा लेती है।उसी की ठुड्डी उठाकर उसका मुख देखने लगती है और कहती-'बेटी! तुम आ गयी इस अभागिनी के समीप,यहीँ इसका सौभाग्य।'
▪मईया तो अब अपनी देवरानी की पुत्री अजया को भी नहीँ पहचान पाती और दीर्घश्वास लेकर कहती है-'मैँ अब किसके सहारे किसी को बुलाऊँ? किसी कन्या के पिता क्या अब मेरी बात सुनेँगे? कोई क्योँ इस सूने घर मेँ अपनी पुत्री भेजेगा?'
🔅अजया कहती है 'मुझे कोई बुलाने की आवश्यकता है?'
▪नन्दग्राम की बालिकाएँ मईया की अवस्था देखकर हँस नही पाती;किन्तु दुखी स्वर मेँ कहती है-'कन्हैया भईया नहीँ हैँ तो अब यह घर भी मेरा नहीँ रहा?'
🔅मईया चौँकती हुई उस बालिका का मुख फिर देखती है और ह्रदय से लगाकर कहती है-'बेटी! घर तो तेरा ही है।' कन्हैया यहाँ रहे यां मथुरा में रहे,तेरे स्वत्व पर क्या प्रभाव पड़ता है? लेकिन मेरा तो यह सोचकर ही ह्रदय दो टूक हो जाता है की मेरी इस बेटी के विवाह मेँ कन्हैया भाई का स्थान लेने आगे नहीँ बढ़ेगा।
▪अजया कहती है-कन्हैया आयेगा और अवश्य आकर ही रहेगा' और स्वयं कहकर संकुचित होती है-तो क्या हुआ कन्हैया भईया मेरे विवाह मेँ नहीँ होंगे,मेरे तो बहुत से भाई है।
🔅कन्हैया भईया तो भाई दूज को मेरे हाथो से मोदक खाने अवश्य ही आयेँगेँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆
No comments:
Post a Comment