🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-13] ▪
📬 कल हमनें आस्वादन किया कि "कोई नही कहेगा कि वन में दाऊ-कन्हैया नहीं हैं, छाक जायेगी तो बालक हैं, कपि है और कोई न भी हो तो भी उसे लौटा लाकर मईया को दुखित करने का भूल तो कोई कर नही सकता। अब आगे......
🔅विषम समय होता है सांयकाल।
▪मईया दिन ढलते ही आतुर हो उठती है--'बालक अभी लौट नहीँ रहे हैँ और वंशी भी सुनायी नहीँ पड़ रही?'
🔅आज सब बालक कहीँ वन मेँ दूर चले गये है।
▪'मईया बार-बार नन्द बाबा के समीप सन्देश भेजती है--'बालक कहीँ भटक जा सकते हैँ,उन्हेँ जाकर ले आओ।'
🔅इस सब के साथ मईया को ऋतु के अनुसार शीतल यां ऊष्ण जल दाऊ-कन्हैया के आने पर स्नान के लिए प्रस्तुत करना है।
▪सेविकाओँ को अनेक बार गोष्ठ मेँ देखने जाना पड़ता हैँ 'गायेँ आ गयी?'
🔅अन्त्तत: गायो के आ जाने का समाचार भी मईया को मिलना ही है।
▪लेकिन मईया स्वयं अब भवन मेँ नहीँ रह पाती।
🔅'दोनो आते ही खेल मेँ लग गये? दिनभर वन मेँ खेलने से दाऊ-कन्हैया का मन नही भरा?
▪मईया तो पुकारती ही जाती है--'दाऊ ! कन्हैया ! अरे तुम सब कहाँ हो? बेटा भद्रसेन !'
🔅भद्र को अब मईया के सन्मुख जाने मेँ संकोच होता है क्योंकि भद्र भी अब पहले के समान वन से सीधे नन्दगोष्ठ मेँ नहीँ जा पाता।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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