🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-60] ▪
🔅कन्हैया किसी के भी अधर से अपनी वंशी लगाकर हठ करता था-'तू बजा!' जाने कितनी बार मईया से ही मनुहार करता,मचलता था--मईया तू बजा।'
▪कन्हैया के हठ पर फूँक मारकर इस वंशी से पता नहीं कितनो ने छोटी-बड़ी सीटी जैसे ध्वनि निकाली है; किन्तु वंशी तो उस वंशीधर से ही बजती थी।
🔅कदम्ब या तमाल के नीचे ललित त्रिभंग से कन्हैया खड़ा है। मयूरपिच्छ झुक आया है,कर्ण-कुण्डल भुजा का स्पर्श करने लगता है। पतले,नन्हें सुकुमार अधर संकुचित हो गये हैँ, बड़े-बड़े दृग अर्धोन्मीलित हो रहे हैं, किसलय-कोमल अंगुलियाँ वंशी के छिद्रों पर जम गयी है। ब्रजपति के मूर्तिमान सौभाग्य की जिसने भी यह झलक पायी,धन्य हो गया।
▪मईया ने तो अपने आँगन मेँ ही कन्हैया को वंशी बजाते देखा है। वह वंशी बजाता था तो गोपियाँ,ग्वाल ही नहीँ, गायें तक भागकर आँगन में आ जाती थीं। कपियों ,पक्षियों से भवन के छज्जे झूम उठते थे।
🔅मईया वंशी हाथ में लेती है तो अब भी लगता कि उनका लाल आकर बड़े दुलार भरे स्वर मेँ कहेगा--'मैं बजाऊँ?'
▪कन्हैया वंशी से तन्मय हो जाता था और वह बेमन से तो वंशी मेँ आधी फूँक भी नहीं मारता था। वंशी कन्हैया की साधना थी। वंशी कन्हैया की सहचरी और सरसता की मूर्ति थी। वही वंशी अब नीरव पड़ी है।
🔅मईया वंशी से तो ऐसे बाते करती है,जैसे वंशी इनकी बातों का उत्तर देगी--'तू फिर बोलेगी कन्हैया आयेगा और तुझे अपने अधरों पर रखकर फिर मुखरित करेगा। तू भी मेरे समान उसके स्पर्श से वञ्चिता हो रही है। 'लेकिन तू उदास श्रीहीन मत बन! तू खिन्न दीखेगी तो कन्हैया भी दुखी होगा।'
▪मईया अनेक बार चौँकती है और कहती है-'वह अपनी वंशी भूल गया।'वंशी के बिना कैसे रहता होगा?'
🔅'मईया के मन में पता नहीँ कितनी बातें उठती हैं --'वंशी ही नहीं है तो उसे ब्रज स्मरण आयेगा?' उसके पास तुझे भेज दूँ?
▪बड़ा कठिन है यह काम। मईया किसके द्वारा वंशी अपने कन्हैया के समीप भेजे? दूसरे किसी को वंशी छूने देना ही इसका ह्रदय स्वीकार नहीं करता है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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