🔆 【जय गौर हरि】 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-2] ▪
📬कल हमनें आस्वादन किया कि ब्रजराज को महाराज उग्रसेन तथा वसुदेव जी आने ही नहीं दे रहें हैं।' किन्तु मैया है की आशा लगाए बैठी है।" आज आगे......
🔅'कन्हैया आयेगा?'
▪मईया के मनमेँ आशंका है, किन्तु भय के मारे वह मुख पर इसे ला नहीँ पाती।
🔅माता रोहिणी अभी ब्रज मेँ हैँ; किन्तु अब यह तो स्पष्ट है कि उन्हेँ लेने किसी भी दिन मथुरा से रथ आ सकता है।तब वसुदेव जी कान्हा को ब्रज कैसे भेजेगेँ?
▪'कन्हैया नहीँ आयेगा'- मईया आगे कुछ सोच नहीँ पाती। दाऊ के बिना कन्हैया कैसे रहेगा? मईया से अधिक इसे कौन समझ सकता है कि कन्हैया के प्राण बड़े भाई मेँ बसते हैँ। नीँद मेँ भी वह 'दादा-दादा' ही पुकारता है। लेकिन अब दाऊ ब्रज मेँ कैसे रह सकते हैँ?
🔅'सम्भवत: कन्हैया अपने बड़े भाई के कारण ही मथुरा रुका है।' मईया का अपना समाधान है--'कन्हैया रुका है, अत: ब्रजराज, गोप तथा बालक भी रुके हैँ।'
▪कब तक काम देता यह समाधान? ब्रजराज को ब्रज तो लौटना ही था। कितनी विषम विपत्ति लिये वे लौटे, वर्णन मेँ नहीँ आ सकता।कन्हैया का दाऊ के बिना ब्रज लौटना?
🔅ब्रजराज के साथ नन्दद्वार तक दूसरा कोई नहीँ आया उस दिन। पशु, पक्षी, कपि तक शकटोँ(छकड़े) को देखकर दौड़े थे; किन्तु फिर जैसे सब उत्साह मर गया। सब जहाँ-के-तहाँ रह गये। बालक-गोप अपनेँ गृहों को चुपचाप चले गये।
▪'कन्हैया कहाँ है? तुम उसे कहाँ छोड़ आये?'
🔅'वह जिनका है, उनके समीप ही रहेगा। 'फटे-फटे नेत्र ब्रजराज ने किसी प्रकार कहा था --'उसे भूल जाओ महर! ब्रज का कोई युवराज नहीँ है।'
▪'क्या ?' मईया तो जैसे चीत्कार कर उठी- 'तुम उसे छोड़कर लौट कैसे आये? तुम्हारा ह्रदय फट नही गया? नही भी फटा तो यमुना मेँ जल नहीँ था डूब जाने को? तुम मेरे लाल को छोड़कर ब्रज कैसे आ गये? मेरा कन्हैया ला दो मुझे!'
🔄क्रमशः
🔆[श्री राधारमणायो समर्पणम्]
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