🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-21] ▪
📬 जैसा अपने परसों अंक 19 में पढ़ा कि "नन्द बाबा बार बार मईया को समझाते है की जिस नगर में कंस के शासन में चारों तरफ असंख्य मानव, गज और अश्वों के शव पड़ें हों जिसके चारों और रक्त का दलदल मचा हो उस नगर के प्रमुख व्यस्थापक (कन्हैया) को कहीं बाहर जाने का अवकाश होगा ? अब आगे.....
🔅वियोग की अनुभूति कब किसे होगी इसका कुछ नियम तो नहीँ हैँ।
▪ब्रज मेँ वियोग है याँ वियोग की अनुभूति,कहना कठिन है,अत: संयोग को अनुभूति कहना कठिन है।
🔅जब भी किसी को यह स्मृति आती की कन्हैया तो दाऊ दादा के साथ मथुरा चला गया है तब उसी क्षण मेँ उसके शरीर का रस-रक्त सूख जाता है।
▪सब बालक कहाँ आश्रय लेँ?
🔅जब सब दिशाएँ अन्धकार मयि लगने लगेँ और जब विपत्ति का महादैत्य मुख फाड़े निगलने को दौड़ता आता दीखे,तब सब बालक माता की गोद को छोड़कर कहाँ मुख छिपाने जाय?
▪जेठानी या देवरानी के बालको को भी मईया ने कभी पराया नहीँ जाना।
🔅अर्जुन, ऋषभ,विशाल, श्रीदामा भी तो मईया के अपने बालक ही हैँ।क्या हुआ कि कन्हैया से कुछ बड़े हैँ लेकिन दाऊ से तो सब छोटे ही हैँ।
▪यह सब बालक आते ही कटे वृक्ष की भाँति मईया की गोद मेँ गिर पड़ते हैँ।
🔅सबकी आश्रय,सबकी अवलम्ब तो मईया की वात्सल्यमयी गोद ही है।कभी कोई बालक कभी कोई दौड़ा आता और मईया की गोद मेँ गिर पड़ता है और हिचकी ले लेकर रोता हुआ 'कनूं!' शब्द मुश्किल से ही निकलता है,मुख से;लेकिन मईया को तो कुछ जानना-पूछना नहीँ हैँ, क्योंकि यह बालक ही तो मईया के जीवन हैँ और इन सबके कारण तो मईया का आश्वासन जागता है।
▪अनन्त वात्सल्य उमड़ता है जो मईया को जीवित रखता है।
🔄क्रमश:
⚠नोट:: क्रम संख्या 20 नहीं है। परन्तु प्रसंग क्रमसार से ही है। इस लिए 19 के बाद 21 संख्या लिया गया।
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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