🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-65] ▪
🔅मईया ने बहुत सहेजकर अपने कन्हैया के पटुके,कछनियाँ रखी हैँ। अनेक बार वह उनमेँ से कोई उठा लाती है 'यह उसका पदुका है' और लाकर स्वयं चौँकती है-'यह उसी का है?'
▪मईया को लगता है कि भूल से कोई और वस्त्र उठा लायी। फिर जाती है और लौटकर फिर चौँकती है। ब्रज मेँ लोग ऐसे ही वस्त्र तो पहनने लगे है;किन्तु कन्हैया जैसे वस्त्र? यह वस्त्र उसके वस्त्रोँ जैसे हैँ?
🔅ब्रजेश्वरी ;'वस्त्र तो पाये जा सकते है किन्तु आपके कन्हैया की अंगकान्ति कोई कहाँ से ले आये?'
▪उस दिन तपस्विनी पूर्णमासी जी के साथ उनका मधुमङ्गल आ गया। मईया जब उसका पदुका करों मेँ लेकर चौँकने लगी तो पौर्णमासी जी ने कह दिया कि वह भी अब हंसपक्षोज्वल वस्त्र के स्थान पर पीतपट पहनने लगा है।
🔅मईया ने अनेक बार अपने कन्हैया को टोका है--'तू किसके वस्त्र पहन आया?'
▪'किसके वस्त्र?' कन्हैया चौँककर अपनी कछनी या पदुका देखता छूता था--'तूने ही तो इन्हेँ पहनाया था?'
🔅मईया कभी चौँककर पूछती थी-'तू क्या लगा आया वस्त्रों मेँ? तू कहाँ गया था? झाड़ियोँ मेँ घूमता फिरता है?'
▪कन्हैया भी चौँकता था--'नही तो।' अपने वस्त्र देखता था और तब चन्द्रिका-धवल हास्य आता था उसके अधरों पर-'कहाँ,कुछ भी तो इनमेँ नहीँ लगा है।'
🔅कन्हैया की अंगकान्ति पड़कर उसके वसन विचित्र हो उठते थे। वस्त्र लहराते थे,हिलते थे अथवा उठाये हिलाये जाते थे तो कन्हैया की अंगकान्ति उन पर लहराती उनकी नवीन-नवीन छटा बनाती रहती थी। अब मईया को अपने लाल के ही पदुके वैसे नही लगते जैसे उनके कन्धे पर लगते थे तो क्या आश्चर्य की बात है।
▪'कन्हैया जैसे वस्त्र!' मईया के मानस-नेत्रों के सम्मुख वही हरिदाभ पीतपट लहराता है। लहराती है उसपर वही कन्हैया की नील अंगकान्ति। यह तो पीतपट देखते ही कोई और पीताम्बरी देखने लगती है।
🔅'कन्हैया'''?' मईया का शरीर स्वेद-निर्झर बनने लगता है।यह रोमाञ्चकण्टकित,झंझा मेँ काँपता कदलीपत्र जैसा श्री अंग'''।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆
No comments:
Post a Comment