🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-43] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि 'गोष्ठ में पहुँचते ही गोपियो के मन में स्मृतियों का मेला लग जाता है। कन्हैया को देखते ही जान-बूझकर सिर के वस्त्र खिसका देती थी और कन्हैया को ठीक करने के लिए कहती थी। अब आगे......
🔅दूसरे गोष्ठो के,दूसरी गोपियो के ऐसे असंख्य संस्मरण हैँ।
▪मईया तो गोष्ठ मेँ पहुँचते ही ठिठकी खड़ी रह जाती है और अनेक बार उसे भ्रम होता है कि उनका लाल रुन-झुन नूपुर ध्वनि करता हुआ उनके सामने से हँसता-किलकला अभी भागा है और नवजात बछड़ो के मध्य जाकर कहीँ छिप गया है।
🔅मईया गोष्ठ मेँ इधर-से उधर पुकारती भटकती है-'कन्हैया! तू कहाँ छिपा है?' आजा बेटा! मैँ थक गयी हूँ। तू आकर स्तनपार कर। मैँ तेरे लिए माखन भी निकालकर आयी हूँ। अब तो आजा मेरे लाल!'
▪किसी गोबर के तनिक कड़े,बड़े ढेर पर घुँघराली अलकेँ रखे उस लेटे हुए कन्हैया की एक झलक,कहीँ एक कोने मेँ दोनोँ पैर फैलाये बीच मेँ गोबर की छोची ढेरी को दोनोँ लाल-लाल करोँ से थपथपाता,कहीँ दाऊ यां भद्र के साथ कई बछड़े-बछड़ियोँ की पूँछ एक साथ पकड़े इधर से उधर खीँचता और कभी डगमग पग डोरता,हँसता खिलखिलाता--आप इसे मानस भ्रम कहते हैँ तो कहे;किन्तु मईया को यह सब प्रत्यक्ष लगता है। केवल उनका नटखट कन्हैया अब पकड़ मेँ नहीँ आता है। वह भाग जाता है और उन शत-शत बछड़े-बछड़ियो के मध्य छिप जाता है।
🔅बछड़े,बछड़ियाँ मईया को सूँघ सूँघकर फुदकने लगते है जैसे पूछना चाहते हो 'तुम्हारा गोपाल कहाँ छिपा है?' किन्तु इनकी नन्हीँ व्याँ,समझ मेँ कहाँ आती हैँ। इनमे अनेकोँ ने तो नवजलधर-सुन्दर कन्हैया को देखा भी नहीँ है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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