Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 46

🔆    [जय गौर हरि]          🔆

▪     [उन्मादिनी यशोदा-46]     ▪

📬 कल हमने पढ़ा कि " मईया अनेक गोपियों को यमुना के तट पर भेजती है कन्हैया को ढूंढने के लिए और कभी स्वयं पुलिन पर ऐसे ढूंढती है जैसे कोई खोई सुई ढूंढ रही हो। लेकिन सबको यही लगता है की यमुना जी भी उनके वियोग में रुदन कर रही है। उसमें अब जल नही; अश्रुधारा बहती है। अब आगे.....

🔅मैया अपने आप ही कहने लगती है-'कन्हैया इधर नही आया।' यहाँ तो कोई बालक नहीँ आया। पता नहीँ,सब किधर चले गये है।

▪मईया गोपी से कहती है-तू क्योँ बैठी है? तेरे घट उठवा देते हैँ?'

🔅'हाय! वह घट उठवा देने वाला आता होता?' गोपी मईया के चरणो पर मस्तक रख देती है और अब झटपट घट भरकर चल नहीँ देगी तो यहाँ बैठने की अपेक्षा सदा के लिए जल मेँ ही समा जाना अच्छा लगेगा,किन्तु अब यमुना मेँ उतना जल ही नहीँ हैँ। यमुना भी अब अश्रुधारा जैसी अल्पसलिला हो गयी है।

▪मईया कहती है-मुझे कोई कन्हैया का पता नही बतलाती और अपने दोनो हाथ सिर पर रखकर बैठ जाती है।

🔅उनका लाल अब ब्रज मेँ नही है यह स्मरण आते ही उनका शरीर निष्प्राणप्राय हो जाता है।
कोई गोपी हाथपकड़ कर मईया को उठाती है-'चलिये आपको भवन पहुँचा दूँ।

▪'भवन?' मईया ऐसे पूछती है,जैसे उन्हेँ भवन शब्द का अर्थ ही समझ मेँ न आता हो।

🔅'मेरा कन्हैया इसी पुलिन पर बालको के साथ खेलता रहता था। 'मईया पुलिन को घूरती रहती है-'यहाँ वह घरोंदे बनाया करता था और सब एक दूसरे के अंगो पर रेणुका ढालते थे। मैँ कन्हैया का हाथ पकड़कर यहाँ से ले जाया करती थी।' अब मईया का हाथ पकड़कर कोई इसे इस पुलिन से घर ले जाय,यह कितनी विडम्बना है।

▪पूरा पुलिन ही नहीँ,समूचि पृथ्वी जैसे नेत्रो के सम्मुख कुम्हार-चक्र के समान घूमती लगती है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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