🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-75] ▪
🔅सेविका हाहाकार करती कहती है, 'मईया ऐसी बात मत कहिए। 'ब्रजेश्वर सुनेँगे तो मूर्छित होकर गिर पड़ेँगे और कहीँ आपके कन्हैया ने सुन लिया कि मईया! उसे पराया मानती है तो इस ऊखल पर ही सिर पटकेगा।'
▪'ब्रजेश्वरी! हम सबका वध करदो; किन्तु यह बात मुख से मत निकालो!' गोपियों का समूह कन्द्रन करता मईया के चरण पकड़ेगा---'कन्हैया आपका पुत्र है, इसीलिए तो हमारा है। आपके नाते ही वह यहाँ आ सकता है।'
🔅कोई जेठानी या देवरानी समीप हुई तो रोषपूर्वक झगड़ ही बैठेगी--'आप क्या कह रही है ?' बरसाने की सब लड़कियों को मार देना है? वृषभानु दुलारी सुनेगी तो दो क्षण उसके प्राण टिके रहेँगे? हत्या करनी है उसकी?'
▪मईया भयभीत होकर इधर-उधर देखती। इसकी समझ मेँ ही नहीँ आता कि क्या निकल गया उसके मुख से। अनेक क्षण मौन बनी रोती रहती।
🔅मईया ऊखल को देखती है तो उस दिन को भूल नहीँ पाती--उस दिन मेरे सिर पर पिशाच चढ़ गया था। तुम सबने भी तो रोका था। मुझे सब तो मना कर रही थीँ। मैँने किसी की नहीँ सुनी।
▪'यशोदा! और पुत्रवती बन तू?' मईया सिर न पटक दे, इतनी सतर्कता रखनी ही है सबको--'तूने सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ महामाणिक पाया था; किन्तु तू उसे रखने योग्य नहीँ सिद्ध हो सकी। वह इस कठोर ऊखल मेँ बाँधने योग्य था?'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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