🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-40] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया सरसों की
पंक्ति उड़ती देखती कहती है-तुम सब मथुरा जा रहे हो। मेरे कन्हैया से मिलकर कहना कि ब्रज में सब प्रसन्न हैं। उसे कोई दुखद समाचार देकर खिन्न मत बनाना।" अब आगे....
🔅विकट सर्दी पड़ती है। सेविकाएँ प्रार्थना करती हैँ-ब्रजेश्वरी! प्रभात हो गयी है। आपको अब शैय्या त्याग करना चाहिए।'
▪मईया कहती हैँ -'मैँ उठूँगी तो कन्हैया भी जाग पड़ेगा।' मईया अपने अंक मेँ तकिया दुबकाए,उसे थपकी देती रहती है। अन्तत: सेविकाओँ को कहना पड़ता है कि 'वह तो तकिया है।'
🔅'तकिया?' मईया झुककर मुख देखना चाहती है और तकिया देखकर झटपट उठ खड़ी होती है। मईया को अपने आलस्य पर खीझ आती है;किन्तु कोई बात स्मरण रखना इसकी शक्ति मेँ नहीँ रहा,अत:शीघ्र ही सेविकाओं पर खीझने लगती है।
▪इतनी सर्दी मेँ भी महर को बालको पर दया नहीँ आती। उन्हेँ स्वयं तो प्रात: यमुना स्नान का व्यसन है ही और साथ बालको को भी जगा देते हैँ। सुकुमार बालको को सर्दी लग जायगी,यह बात ही नहीँ समझते।'
🔅सेवक-सेविकाओँ के समीप इसका कोई उत्तर नहीँ हैँ।
▪कोई गोपी आश्वासन देती है वन मेँ खुली धूप मेँ आपके कुमार खेलेँगे मईया को कोई आश्वासन सन्तुष्ट नहीँ करता। कन्हैया खेल मेँ लगने पर सब कुछ भूल जाता है अन्तत: बहुत देरतक धूप मेँ रहने पर भी तो कष्ट होता ही है।'
🔅कोई गोप या गोपी मईया को समझाती है-'बालक वन मेँ धूप-छाँह मेँ वृक्षो के नीचे खेलते होगे।' आजकल दिन होते ही कितने बड़े हैँ। सांयकाल शीघ्र आ जायेँगे। दिन चढ़ने पर जाते हैँ और वन मेँ पहुँचते ही दोपहर हो जाती है। थोड़ी देर तो बालको को खेलना ही चाहिए।
▪मईया थके स्वर मेँ कहती है-मै कब कन्हैया को खेलने मेँ रोकती हूँ।' किन्तु वह खेल-खेलकर थक जाता है। लोगो को सर्दी मेँ भूख लगती है किन्तु वह एक पक्षी जितना भी तो नहीँ खाता।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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