🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-52] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि " महर के बताने पर मथुरा अगम्य हो गयी है और कन्हैया बहुत व्यस्त होगा। मेरे जाने से उसे संकोच होगा। कन्हैया ने कहा है कि वह स्वयं आएगा। यह सुनकर मईया कटे वृक्ष के समान हताश होकर गिर पड़ती है। अब आगे.....
🔅मईया बड़े यत्न से शिशु के वस्त्र, आभरण, चौतनिया टोपी बनाती रहती है। इन्हेँ तो स्मरण ही नहीँ रहता कि इनका कन्हैया अब झंगुलिया पहने योग्य नहीँ रहा।
▪कोई सेविका कभी-कभी कह देती हैँ-आपका कन्हैया अब इतने छोटे नहीँ हैँ।
🔅मईया चौँकती है और पटुका तथा धोती सजाने लगती है;किन्तु फिर भूल जाती है।
▪वर्षगाँठ अकेले कन्हैया की ही तो नहीँ आती।दाऊ की वर्षगाँठ का उत्साह मईया मेँ अधिक भ्रम उत्पन्न नहीँ करता।'रोहिणी जीजी तो मथुरा मेँ है यह सोचकर उदास हो जाती है। माता रोहिणी की स्मृति के साथ यह स्मरण आता ही है कि दाऊ अपने अनुज के साथ मथुरा मेँ हैँ।
🔅 कन्हैया ब्रज मेँ नहीँ है,यह स्मृति तो मईया को जैसे प्राणहीन कर देती है।सब बालक तो मईया के अपने ही हैँ।जेठानियाँ हो,देवरानियाँ हो या कोई दूसरी गोपी हो मईया को लगता है सभी बहुत भुलवकड़ है और कोई भी अपने बालको का जन्मदिन स्मरण नहीँ रखती।
▪मईया एक दिन पहले ही बड़े उत्साह से कहती है-'कल विशाल का जन्मदिन है और कल उसे गोचारण करने मत जाने देना।'
🔅विशाल हो या भद्र हो या देवप्रस्थ सभी की माता तो एक ही बात कहती है-'कन्हैया जब यहाँ नहीँ है;जन्मदिन का स्मरण विशाल को केवल रुला सकता है। उसे स्मरण नही रहेगा तो वह गोचारण मेँ अपने सखा का वियोग तो भूला रहेगा।'
▪प्रत्येक सखा के जन्मदिन पर कन्हैया उसे उपहार देता था। अपनी भुजा फैलाकर ह्रदय से लगा लेता था। अब वह यहाँ नहीँ है तो जन्मदिन के अवसर पर बालक को उसके वियोग की स्मृति दिलाकर व्यथित ही तो करना है।
🔅ब्रज मेँ वर्षगाँठ मनाने का पर्व तो कन्हैया के साथ ही मथुरा विदा हो गया।
▪मईया अब इन उपहारो की चर्चा भी कैसे करे जो पहले से सजा रखी है। बालक की माता के चले जाने पर उस सामग्री को हाथ मेँ लेकर रुदन करती है।'कन्हैया नहीँ है। अब कोई इस अभागिनी के हाथों का उपहार नहीँ लेगा , पुत्रहीनों के उपहार भी अभिशाप बन जाते है। मैँ किसी के बालक को कुछ देने योग्य भी नही रही।'
🔅'मईया कहती है-'मैँ दूसरे का अंकधन लेकर इतरा रही थी। कन्हैया तो देवकी का है।' मईया फूट-फूटकर रोती हुई कहती है-' गोपियाँ शील के कारण ही मुँह पर नहीँ कहती; किन्तु कोई अपने पुत्र को मुझ वन्धया के हाथों का उपहार कैसे देगी?
▪ऐसे समय मेँ सेविकाओँ को बड़ी कठिनाई होती है मईया को सम्हालने मेँ।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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