Saturday, 14 November 2015

unmadini yashoda 63

🔆           [जय गौर हरि]            🔆

▪       [उन्मादिनी यशोदा-63]    ▪

🔅सेविकाएँ पंखों को फेँक भी नहीं सकती इसलिए छिपाती फिरती हैं। वह भी नहीँ जानती कि कक्ष मेँ छिपाकर रखें इतने अधिक पंखों का वह क्या करेँगी;किन्तु उनके कन्हैया को यह पंख प्रिय हैं और वह इन्हें अपने मस्तक पर धारण करता है। इन्हें फेँका कैसे जा सकता है। कन्हैया आयेगा तो ढेर सारे पंख पाकर प्रसन्न होगा।

▪पंख मईया के सामने दिखाई न पड़ें, यह सावधानी कितनी भी रखो लेकिन मयूर तो मानने वाले नहीँ हैँ। यह सब भगाने पर भी नहीँ भागते हैँ। ब्रजेश्वरी इन्हें भगाने भी नहीँ देती हैं।

🔅मईया मयूरपिच्छ हाथ मेँ लेते ही धम्म से बैठ जाती है--'मैँ किसकी अलकों मेँ इसे सजाऊँ?' मईया के नेत्रों की धारा सूखना ही नहीँ जानती। शरीर स्वेद से भीग जाता,थरथर काँपती रहती जैसे शीत-ज्वर आ गया हो।उस पिच्छ को कभी घूर-घूरकर देखती और कभी ह्रदय से लगा लेती।

▪कोई दासी समीप आकर कहती -'यह पिच्छ तो बहुत श्रीहीन है।' यह आपके कन्हैया की अलकों मेँ लगने योग्य नहीँ है। मैँ दूसरा उत्तम पिच्छ ढूँढ़ लाउँगी।'

🔅दासी चाहती है कि मईया के करों से पिच्छ लेकर कहीं छिपा दे। पिच्छ सचमुच श्रीहीन है। अब इन कृष्णवियोग-कृश मयूरों के पिच्छों मेँ वह कान्ति रही ही कहाँ है। लेकिन मईया कहती है--'कितने प्यार से पक्षी ने इसे गिराया है।'

▪मईया ही जानती है कि उनके लाल को क्या प्रिय लगता है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪

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