🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-61] ▪
🔅ब्रज में वर्ह-पिच्छ बहुत सुलभ हो गये हैँ। पता नहीं मयूर को क्या हो गया है। यह वन मेँ रहना ही नहीं चाहते। दिन मेँ भी बार-बार भाग जाते हैं और रात्रि मेँ भी वृक्षों के बदले भवनों के ऊपर ही विश्राम करते हैँ। सम्भवत: यह उस कन्हैया को देखने की आशा मेँ ही नन्दग्राम मेँ इधर से उधर घूमते फिरते हैं।
▪पहले यही मयूर पँख फैलाये कन्हैया के आसपास नाचते ही रहते थे। सब महीने इनके लिए पावस थे;क्योँकि कन्हैया इनके सम्मुख था। तब यह हर्ष मेँ फूले फिरते थे। इनके पंख तब इतने दृंढ़ थे कि कदाचित ही कोई पंख यह गिराते थे और अब तो ब्रज मेँ पतझड़ पैर तोड़कर बैठा है। यह मयूर रात्रि मेँ जहाँ बैठते हैँ, प्रात:वहीं सब पंख झाड़ देते हैं।अब तो इनके पूरे पंख ही देखने में नहीँ आते और जब पंख उठाकर नृत्य करने का उत्साह ही विदा हो गया, पंखो का व्यर्थ भार भला क्यों उठाए फिरें ?
🔅'इन्हें श्यामसुन्दर मस्तक पर धारण करते हैँ।' बालिकाओं को सह्य नहीँ है कि कोई मयूरपिच्छ से व्यजन बनाये। प्रात:काल लड़कियाँ उठते ही इन पिच्छों को समेटने भागती हैँ जैसे इनसे मयूरपिच्छ माँगने कन्हैया आने ही वाला हो।
▪ब्रज मेँ इतना निष्ठुर प्रश्न किसी बालक से कोई करने का साहस नहीँ करता कि--'तू इन्हें अपने केशों मेँ लगायेगा?' यही बालक जो मयूरपिच्छों के लिए वनों मेँ भटकते फिरते थे और अपने केशों मेँ पंख सजाते थे।
🔅बालक तो अपनी-अपनी रुचि के कोई हंसपिच्छ और कोई शुकपिच्छ के प्रिय थे; किन्तु कन्हैया के केशों मेँ अपने हाथों से मयूरपिच्छ लगाने का उत्साह किस ह्रदय मेँ नहीं होता!
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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