🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-23] ▪
📬 कल हमने पढ़ा की "बालक तो मईया को यह कहते ही मूर्छित हो जायेंगे की कन्हैया को अक्रूर रथ में बिठाकर ले गए थे लेकिन मईया साथ ही हड़बड़ा कर कहेगी-नहीं ! कन्हैया आज आनेवाला है। अब आगे......
🔅मईया सब सेवकों को कहती है-"तुम सब कन्हैया को ढ़ूँढ़ते क्यों नहीँ हो ? मेरा कन्हैया कहाँ गया है ? गोष्ठ मेँ है,यमुना तट पर है यां वन मेँ चला गया है?"
▪'तुम लोग यहाँ बैठे क्या कर रहे हो?"
🔅कितना नन्हा सुकुमार है मेरा कन्हैया। कब से गया है!! सेवकों पर खीझती हुई कहती है "जाओ तुम सब ढूँढ़ कर लाओ।'"
▪लेकिन कोई कहाँ ढ़ूँढ़े कन्हैया को?
🔅जन्म जन्म के योग-यज्ञ,ध्यान-तप-धर्म से परिशुद्ध अन्त:करण मुनिगण भी जिसका पता नही जान पाते उसे कोई ढ़ूंढ़कर कैसे पा सकता है?
▪ठाकुर अपना पता स्वयं जिसे दे,तब ही वह मिल सकता है।कन्हैया की प्राप्ति तो उसी की अनुकम्पा पर निर्भर है;लेकिन ब्रज मेँ कोई यह बात कहेगा?
🔅कन्हैया क्या कभी इन सबके लिए आगम्य रहा है? लेकिन मथुरा जा बैठा है। कन्हैया को कितना संकोच होगा यदि कोई यहाँ से वहाँ जाय।
▪सेवक तो यह सारी बात भी मईया को कहने की स्थिति मेँ नहीँ हैँ।
🔅मईया सब सेवकों से कहती है,कन्हैया को पानी बहुत प्रिय है।देखो तो सही यमुना किनारे तो नहीँ चला गया।
▪मईया स्वयं चल पड़ती हैँ-'कन्हैया धारा मेँ उतर पड़ेगा और उसके सब साथी भी शिशु ही तो हैँ।'
🔅सेवक नम्रता पूर्वक निवेदन करते हैँ-'यमुना तट पर कोई नही है। हम सब अभी आये है उधर से। सम्पूर्ण पुलिन सूना पड़ा है।
▪ सेवकों का तो यह कहते कंठ भर आता है।नेत्रो मेँ उमड़ते अश्रु मुख छिपा कर पोंछते है। हाय! जो पुलिन उन पाद पंकजों से पुनीत होता रहता था,जहाँ कन्हैया के साथ बालको का उल्लास गूंजता था और जहाँ गोपियाँ बिना किसी कारण जल भरने के बहाने जमी रहती थी, जहाँ से बन्दर,मृग,पक्षी हटने का नाम नहीँ लेते थेँ वह पुलिन सूना पड़ा है और वहाँ एक कौआ तक दिखाई नही देता। अब तो उस पुलिन पर जाते प्राण कापँते है।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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