🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-5] ▪
📬 कल हमनें आस्वादन किया कि मईया को संतोष कहाँ है अपने कन्हैया के लिए स्वयं दधि मन्थन किये बिना। अब आगे........
🔅मईया दधि-मन्थन करती जाती है मंद मंद मधुर स्वर मेँ अपने चपल नवघन सुन्दर कन्हैया के चरित गाती जाती है।
▪'कन्हैया अभी उठा नही?'
🔅बार- बार घूमकर अपनी शय्या की तरफ देखती है।फिर स्वयं हँसती है-'मुझे क्यों भूल जाता है कि कन्हैया अब मेरे गोद मेँ सोने जितना नन्हा नहीँ है?'
▪सेविकाएँ,गोपियाँ, सेवक सब भरे दृग देखते हैँ 'हाय अब ब्रजेश्वरी इतनी प्राय: किसके लिए दधि-मन्थन करती है?'
🔅कोई कुछ बोलता नहीँ ना ही कोई संकेत करता।इसी भ्रम मेँ मईया कुछ प्रसन्न भी है और उनकी अपार वेदना विस्मृत तो है लेकिन कुछ पल के लिये।
▪मईया की विस्मृति कब तक टिके रहेगी?
🔅दधि-मन्थन समाप्त तो होना ही है।माखन ऊपर आता है तो उसे निकालने से पहले ही पुकारने लगती हैँ-'दाऊ! कन्हैया!आ जाओ दौड़कर।
▪देखो,कितना उज्वल,कितना मधुर माखन निकला है।कभी ही ऐसा होता है कि मन्थन-भाण्ड से माखन निकाल कर दूसरे पात्र मेँ रखेँ।प्राय: उस मन्थन-पात्र मेँ ही माखन पड़ा रहता है और मईया उठकर दौड़ती है द्वार की तरफ--'लगता है सब गौ दोहन मेँ लग गये।'
🔅पता नहीँ महर को इतनी क्या शीघ्रता रहती है।एक बार बालकों को घर मेँ तो आने देना चाहिए।'
▪'कन्हैया कहाँ हैँ ?'
🔅गोष्ठ के द्वार पर पहुँचकर जब मईया चारो तरफ हैरान हुए देखती-पूछती है तो गोपों के करों से दोहनी छूट जाती हैँ। गायँ भी कन्दन भरी हुंकार करने लगती हैँ।बछड़े तक साहस नहीँ कर पाते मईया के समीप आने का।
🔄क्रमश:
▪ [श्री राधारमणायो समर्पणम्]
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