🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-79] ▪
🔅 गोपियाँ मईया को समझाती हैं कन्हैया इस संकट मेँ मथुरा नहीँ छोड़ सकता।
▪'मैँ जाऊँगी?' मईया सुनना नहीँ चाहती कि मथुरा जाना इस समय सम्भव नहीँ है। बाबा को बहुत कठिनाई से इसे रोके रहना पड़ता है।
🔅'जरासन्ध,जरासन्ध,जरासन्ध! सुनते सुनते जैसे कान पक गये हैँ। जरासन्ध आने वाला है। जरासन्ध आ रहा है। जरासन्ध आ गया है। जरासन्ध हारकर भाग गया। मईया जरासन्ध के नाम से चिढ़ती है--'यह कंस क्या मरा,उसका श्वसुर प्रेत की भाँति मथुरा के पीछे ही पड़ गया है।'
▪इन सम्वादों मेँ लगभग अन्तिम सम्वाद ही था--'जरासन्ध के आक्रमणों से बचने के लिए दाऊ-कन्हैया मथुरा के सब लोगों को लेकर द्वारिका चले गये। वहाँ समुद्र के मध्य मेँ जा बसे हैँ।'
🔅'और करते भी क्या। जरासन्ध से पीछा तो छूटा।'
▪मईया ने उस समय जैसे सन्तोष की श्वास ली--'वे दोनों सुख पूर्वक रहेँ,सुरक्षित रहेँ। हमारा क्या है,हम कैसे भी जीवन के दिन काट लेँगे।'
🔅'द्वारिका कहाँ है? कितनी दूर है?' मईया यह जिज्ञासा भी बहुत डरते डरते करती है। द्वारिका से यहाँ के मार्ग मेँ कहीँ जरासन्ध तो नहीँ पड़ता?
'कन्हैया कैसे आयेगा?' अब सम्वाद नहीँ आते। मईया प्राय: हताश हो जाती है--'मार्ग मेँ जरासन्ध के सैनिक उसकी घात मेँ बैठे होँगे। उसे नहीँ आना चाहिए। वह सकुशल रहे।
▪मईया का आग्रह अब दूसरा है--'महर! तुम भी तो नहीँ जा सकते। तुमको जरासन्ध ने पकड़ लिया तो कन्हैया वहाँ बैठा नहीँ रह सकेगा। वह सुख से रहे।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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