Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 22

🔆          [जय गौर हरि]          🔆

▪        [उन्मादिनी यशोदा-22]  ▪

📬 कल हमनें पढ़ा कि " सबकी आश्रय सबकी अवलम्ब तो मईया की वात्सल्यमयी गोद ही है। कभी कोई बालक मईया की गोद में गिर पड़ता है कभी कोई हिचकी लेता हुआ 'कनू' शब्द मुश्किल से कहता है।  मईया को कुछ पूछना नही हैं, क्योंकि यह बालक ही तो मईया के जीवन है। अब आगे....

🔅मईया पीतमुख, कृशकाय बालक को अपनी बाहों मेँ समेटकर कहती है-'बेटा! मै तो वन मेँ नहीँ जा सकती लेकिन तुम वन सीमा तक जाकर देखो तो सही क्योंकि मुझे ऐसा लगता है तुम्हारा सखा (कन्हैया) आ रहा है।

▪ तुम तो जानते हो महर कभी झूठ नहीँ बोलते।' 'वह तो सदैव यही कहते है कन्हैया आयेगा और अवश्य आयेगा!'

🔅मईया बालकों के अश्रु भरे दृग नहीँ देख सकती।अपने आंचल से पोंछती हुई कुछ खा लेने को कहती हैँ।

▪कन्हैया अगर तुम सबको रोता देखेगा तो खुद भी दुखी हो जायेगा।'

🔅'बालको को तो यही दुख है की कन्हैया हमसे रुठ कर चला गया है।'

▪मईया कहती है जब मेरा कन्हैया आयेगा तब मैँ उसे समझा दूँगी कि मित्रों से कभी रुठा नहीँ जाता!!

🔅मईया को भी यही लगता है कि उनका कन्हैया मित्रों से लड़कर वन मेँ कहीँ भाग गया है।

▪किस बालक को खाने मेँ क्या पसंद है मईया सब बालको की रुचि जानती है;किन्तु कन्हैया के बिना बालक मुख मेँ तब कुछ डालेँगे,जब स्वयं मईया भी कुछ स्वीकार करे।

🔅मईया सब बालकों को सहलाती है-'कन्हैया बहुत चंचल है। तुम सबको दुबला देखकर वह तुम्हेँ चिढ़ायेगा।

▪बालक कह देते हैँ-चिढ़ा लेगा तो क्या हो जाएगा ;बस आप कन्हैया को बुला दो।'

🔅मईया बालकों का शरीर,उनके पैरो के तलवे देखती-सहलाती है-'हाय! तुम सब काँटो मेँ भटकते फिरते हो? तुम्हारे शरीर मेँ खरोंचे हैँ और पैरों मेँ काँटे लगे हैं।

▪बालकों को कहाँ अब शरीर की सुधि रही है।वन मेँ वियोग की स्मृति आने पर कन्हैया को दूँढ़ने मेँ कुश-कंटक दीखते हैं ?

🔅मईया का तो मानो यह सोचकर ही ह्रदय फट जाने वाला हो उनका 'कन्हैया भी ऐसे ही भटकता होगा?'

▪बालक तो यह कहकर ही अवश्य मूर्छित हो जायेँगेँ की कन्हैया को अक्रूर रथ मेँ बिठाकर ले गये थे लेकिन मईया साथ ही हड़बड़ा कर कहेगी-नही! कन्हैया आज आनेवाला है।'

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय  समर्पणम्]

🔆▪🔆▪🔅▪🔆▪🔆

No comments:

Post a Comment