Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 1

🔆      【 जय गौर हरि】       🔆

▪     [उन्मादिनी यशोदा-1]    ▪

🔅वह दिन ब्रज का ऐसा भी दिन होता है जो जीवन मेँ विषम विष वज्र के समान जमकर बैठ ही जाय।ब्रज-जन-जीवन मेँ उस दिन का विष जमकर ही बैठ गया और उसने सभी को उन्मत्त बना दिया।मैया यशोदा तो उन्मादिनी ही हो गयी।

▪कितनी प्रतीक्षा थी उस दिन की।तनिक खटका होता था और मैया द्वार की ओर भागती थी। दिन मेँ अनेक बार सेवक भेजती रही थी-'देख आओ कि मथुरा से छकड़े आ रहे हैँ।' श्री ब्रजराज को मथुरा गये बहुत दिन हो गये थे।

🔅ब्रज मेँ तो लगता था कि युगों बीत गये हैँ।प्रधान गोप सभी चले गये थे, ब्रजराज के साथ और बालक तो कोई ब्रज मेँ रहा ही नहीँ था। सब मथुरा चले गये थे।पता नहीँ वहाँ ब्रजराज क्या करने लगे थे।

▪इतने दिन भी कोई अपने घर से दूर रहता है। पता नही, बालकोँ की क्या दशा होगी। वे संकोची बालक कैसे रहते होंगे-नगर मेँ। वहाँ कौन मनुहार करके कन्हाई को खिलाता होगा। मथुरा से सन्देश आते थे।

🔅कोई न कोई चर प्रतिदिन आता है। राम-श्याम (बलराम और कान्हा) वहाँ मथुरा मेँ प्रतिदिन आने वालों को बसाने मेँ लगे हैँ।

▪ब्रजराज को महाराज उग्रसेन तथा वसुदेव जी आने ही नहीँ दे रहे हैँ।'अब कल आवेँगे।लेकिन यह कल है कि कभी आज नही बनता।

🔄क्रमश:

🔆[श्री राधारमणायो समर्पणम्]

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