🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-24] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "सम्पूर्ण पुलिन सूना पड़ा है। जो पुलिन उन पाद पंकजों से पुनीत होता रहता था, जहाँ कन्हैया के साथ बालकों का उल्लास गूंजता था और जहां गोपियाँ बिना किसी कारण जल भरने के बहाने जमी रहती थी उस पुलिन में आज एक कौआ तक नही दिखाई देता। अब आगे......
🔅सब सेवक कहते है आपके कुमार अब बड़े हो गये है और अब वह गायेँ चराने जाते है।
▪कोई भी सेवक ब्रजेश्वरी को यह कहने का साहस नहीँ कर पाता कि मईया कन्हैया नहीँ हैँ।
🔅मईया कहती है 'कन्हैया को घर मेँ बैठना अच्छा ही नहीँ लगता। वन-वन भटकता फिरेगा।तुममेँ से कुछ सेवक चले जाओ।'
▪मईया कैसे मान ले कि दाऊ-कन्हैया गायो के पीछे भटकते थकेँगेँ नहीँ,'तुम लोग गायेँ घेर लेना। दोनो कुछ समय तो विश्राम कर सकेँगे और अगर दोनो खेलने मेँ लगेँ हो तो खेलने देना।'
🔅सेवक कहते है ब्रजेश्वरी जी आप तो जानती हैँ कि आपके कन्हैया को किसी बड़े गोप का भी साथ जाना स्वीकार नहीँ है। कन्हैया जब पहले दिन बछड़े चराने चला था,तब नन्दबाबा बहुत चाहते थे कि वह स्वयं याँ दूसरे गोप साथ रहेँ किन्तु कन्हैया ने किसी को साथ आने नहीँ दिया और सब पर खीझने लगा था।
▪मईया सेवकोँ की बात समझती है;किन्तु मन नहीं मानता --
🔅मईया को दिन मेँ अनेक बार यह धुन चढ़ी रहती है दूर से कोई देख आओ कि बालक दाऊ-कन्हैया किधर गये हैँ?
▪ सेवकों को चुपचाप इसे मानकर वन मेँ जाना है कि कम से कम गायो को,दूसरे बालको को दूर से देखकर आ ही सकते हैँ
🔅सेवको की स्वयं की भी मनस्थिति कहाँ ठीक है।सेवक कभी सेवक की भांति रहे ही कब।
▪कन्हैया किसी सेवक को बाबा,किसी को ताऊ और किसी को चाचा कहता है। कन्हैया के वियोग मेँ व्याकुल सेवकोँ को भी यही लगता है ब्रज का चपल नवघन सुन्दर कन्हैया सचमुच आज प्रात: ही गोचरण करने वन मेँ गया है।
🔅 मईया ब्रजेश्वर से ही उलझ पड़ती है -'कोई नहीँ देखता मुझ दुखिया की ओर। मेरा अंग धन खो गया मुझसे।स्पर्शमणि पाकर मैँ कंगालिनी हो गयी और कोई मुझपर दया नहीँ करता।' वियोग का स्मरण होनेपर मईया क्या बोल जायगी,कुछ ठिकाना नहीँ-'मैँने किसी का कुछ नहीँ बिगाड़ा। क्योँ मुझसे ही सब शत्रुता करने लगे हैँ। कन्हैया को लेने कोई क्योँ नही जाता हैँ?
▪ऐसे समय मेँ सेवकों के लिए एकान्त मेँ जाकर रुदन करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नही रहता।
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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