🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-31] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया किसी भी क्षण वन की और दोड़ पड़ती है और कहती-कन्हैया आ रहा है। उन्हें लगता की कोकिला, भ्रमर सब उसके लाल के स्वागत के लिए बोलते है। पवन शीतल सुरभित कन्हैया के बिना आये ऐसा हो ही नही सकता। ब्रजधारा का सत्य भी तो यही है। अब आगे........
🔅विनयशील व्यक्ति जैसे अपना स्वभाव त्यागकर क्रोध से प्रचण्ड हो उठता है,वैसे ही अब ब्रज मेँ बसन्त अब ग्रीष्म बन कर आता है।
▪कन्हैया के रहते तो किसी को पता नहीँ लगा कि ग्रीष्म भी ब्रज मेँ आता है;लेकिन अब तो चैत का उत्तरार्ध ही तप्त करने लगता है।
🔅पृथ्वी दिन के प्रथम प्रहर मेँ ही यात्रा के अयोग्य हो जाती है। सूर्य के किरणेँ मानो विष वर्षा करती हो और वायु सर्प के श्वास के समान 'सूं सूं' करती चलती हो।
▪सुरपति का शासक जब ब्रज मेँ नहीँ है तो वायु अथवा सूर्य यहाँ क्योँ संकोच करेँगे।
🔅मईया सूर्योदय के तनिक ही सेवको से आग्रह करने लगती है-'सब बालको को वन मेँ से बुला लाओ' और इस ग्रीष्म मेँ महर पता नहीँ गायो को भी चरने क्यो छोड़ते हैँ।
▪श्री ब्रजराज मईया को समझातें हैँ कि गायेँ कुञ्जो में बैठीं रहती हैँ और अगर उन्हेँ वन मेँ न भेजा जाय तो वे स्वस्थ नहीँ रहती।
🔅मईया का दूसरा आग्रह है कि दाऊ-कन्हैया मेँ अभी समझ ही कितनी हैँ।दोनो धूप मेँ दौड़ते फिरेँगे।पृथ्वी तप्त हो रही है और वायु कितनी उष्ण है;कन्हैया इतना चपल है कि वह क्या बालको की बात मानेगा?
▪कन्हैया का सुकुमार शरीर इतनी विषम वायु-लू कैसे सह सकेगा? इतनी गर्मी मेँ तो बड़े गोपो को गोचारण के लिए जाना चाहिए।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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