🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-39] ▪
📬 कल हमने पढ़ा कि "मईया लेखिका से पूछती है-मैं अब किसको आगे बैठाकर तेरे पुष्पों से उसका केश सजाऊं? फिर कभी खुद ही पुष्प-चयन करने लगती है। कभी सोचती है कन्हैया तो अब चला गया तो कोई अकेला भ्रमर भी इतने सारे मादक सुरभि-भर पुष्पो पर भटककर नहीं आता। कन्हैया था तो भ्रमरो जे झुण्ड उसके आसपास गूँजते मंडराते थे। अब आगे.......
🔅मईया देर रात्रि तक दीपक जलाये व्यालू लिये बैठी रहती है-'कन्हैया को चन्द्रिका-धवल रात्रि मेँ यमुना पुलिन पर घूमने की धुन लगी रहती है। दिनभर तो गोचारण से थका आता है फिर भी भाग जाता है। इतनी देर हो गयी,कन्हैया अब तो आता ही होगा।'
▪गोपियो का तो मईया को कुछ कहने का साहस नहीं होता।
🔅ब्रजेश्वर किसी भी प्रकार महर को समझाते हैँ-'कन्हैया अवश्य ही आयेगा,किन्तु मथुरा से रात्रि मेँ तो नहीँ आ सकता। अभी तुम कक्ष में जाकर शयन करो।'
▪मईया महर से पूछती है- 'कन्हैया मथुरा चला गया? ऐसे चौँक पड़ती है जैसे यमुना तट तक गया था उनका लाल और उनसे पूछे बिना मथुरा चला गया हो।
🔅मईया कहाँ ब्यालू करती है उन्हेँ दूध तो पिलाया जा सकता। दूध पीने को कहने पर मईया कन्द्रन करते कहती है-'यह मरी वृद्ध बुढ़िया ही तो दूध पीने को रह गयी है। मेरे लाल को कौन वहाँ मनुहार करके दूध पिलाता होगा?'
▪निद्रा तो मईया से जैसे डरकर भागती हो क्योकी रातभर मे जाने कितनी भार आँगन मेँ आकर बैठ जाती है और कितनी बार कक्ष मेँ जाती है। दासियाँ यदि हठ करके मईया को लिटा भी दे तो थोड़ी देर नेत्र बन्द करके पड़ी रहती है और फिर चौँककर उठकर बैठ जाती है और चन्द्रमा की तरफ देखकर कहती है-'चन्द्र! मेरा चन्द्रमुख कन्हैया सो रहा होगा। उसे वहाँ नि:संकोच निद्रा आती है? तुम उसे मधुर स्वप्न देना।'
🔅मईया तो कभी शैया देखती है और फिर किसी भी सेविका को जगाने लगती है-कन्हैया शैया पर नहीँ है। वह उठकर कहाँ चल गया।
▪कन्हैया इतना भोला है कि मुझे ढ़ूँढ़ने के लिए नीँद मेँ उठकर ही चल पड़ता है। हाय! मैँ क्यो उठकर आँगन मेँ गयी। अब कहाँ ढ़ूँढ़ूँ उसे?'
🔅सेविकाएँ न सम्हालेँ तो मईया रात्रि मेँ ही भवन से निकल पड़ती है कन्हैया को पुकारती। लेकिन यह कहना भी तो मईया को व्याकुल ही करेगा कि कन्हैया मथुरा मेँ हैँ।
▪मईया कभी सारसो की पंक्ति उड़ती देखती कहती है-तुम लोग मथुरा जा रहे हो। मेरे कन्हैया से मिलकर कहना कि ब्रज मेँ सब प्रसन्न हैँ। उसे कोई दुखद समाचार देकर खिन्न मत बनाना।'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]
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