Monday, 9 November 2015

unmadini yashoda 34

🔆        [जय गौर हरि]           🔆

▪      [उन्मादिनी यशोदा-34]  ▪

🔅कन्हैया को वर्षा सदा से प्रिय रही है।

▪मईया कहती हैँ 'कन्हैया जब घुटनो को सरकने लगा था तभी से पानी के पास दौड़ता था।उसे तो वर्षा मेँ भीगते हुए नाचने,छपाछप करते चलने का व्यसन हैँ। वर्षा के समय कक्ष से बाहर भागना स्वभाव है उसका।'

🔅मईया सोचती हैँ पता नहीँ मेरा कन्हैया कहाँ भीगता होगा।' जो घर  मेँ वर्षा के समय बाहर भीगने भाग जाता था,वह वन मेँ गुफा मेँ बैठा रहेगा?

▪मईया का कहना है-'वहाँ पर सब बालक ही तो हैँ। सब भीगते होगे। भीग-भीग कर सब नाचेँगे और पानी मेँ दौड़ते जहाँ-तहाँ गिरेँगे।'

▪वर्षा प्रारम्भ होते ही मईया कछनियाँ,पटुके ढ़ूंढ़ने लगती है और सेवको से कहती है-'सब बालक भीग गये होगे। तुम मेँ से कोई कपड़े ले जाओ।'

🔅'मईया जब तक हम पहुँचेँगे,उनके पटुके,कछनी सब सूख चूकी होँगी।'

▪सेवक किसके वस्त्र ले जाय?

🔅लेकिन मईया से कहते है-'वर्षा के बन्द होते ही गायेँ इधर-उधर चरने दौड़ जाती हैँ और सब बालक आम या जामुन चुननेँ मेँ लग जाते है। वह सब इस समय कहाँ होगे,कोई अनुमान नहीँ है।'

▪वर्षा जब देर तक नहीँ खुलती तो मईया बेचैन होती है-महर ऐसे दिनो मेँ भी बालको को रोकते नहीँ हैँ।

🔅कई बार तो वर्षा की झड़ी लगती है और मेघ रात-दिन बराबर बरसते है तो ऐसी वर्षा मेँ गायेँ क्या चरती होगी।' गाय तो भैँस की भाँति पानी मेँ नेत्रो तक मुख ड़ुबोँकर नहीँ चर सकतीँ

▪किन्तु बालको को भीगे वन में दौरना अति प्रिय है।

🔄क्रमश:

▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्]

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