🔆 [जय गौर हरि] 🔆
▪ [उन्मादिनी यशोदा-90] ◾
🔅काक जब भिन्न ढंग से बोलता है तो मईया का ह्रदय कापँता है--'यह कोई अशुभ तो नहीँ सूचित करता!
◾मईया कहती है--'काक! कुछ अनर्थ होने वाला हो तो मेरा होने दो लेकिन मेरे कन्हैया को कुछ नहीँ होना चाहिए। तुम मेरे सिर पर बैठ जाओ। मुझ दुखिया के लिए तो मृत्यु भी वरदान है।'जैसे अनर्थ कौए के नियन्त्रण मेँ ही हो!
🔅सेविकाएँ कातर कंठ से कहती है-'मईया आप ऐसी अमंगल बात क्यो मुख से निकालती हैँ?'
◾अमंगल बात? मैँने किसी के लिए कुछ अमंगल कह दिया है क्या ? मईया इतनी भोली है कि इसे अपनी बात का भी ध्यान नहीँ रहता। यह काक कुछ कह रहा है।
🔅कोई सेविका कह देती-'यह तो अपने साथियो को आपकी रोटी खाने का निमन्त्रण दे रहा है। दूसरा कुछ कहे भी क्या ?
◾मईया फिर कौए से अनुरोध करती लगती है-मुझ दुखिया पर तनिक दया करो। तनिक उड़कर देखो और मुझे बताओ कि मेरा लाल आ रहा है? मैँ अपने उस अंकधन के बिना अन्धी हो रही हूँ।'
🔅आज काक मेरे पूछने मेँ आ बैठा था। काक कहीँ उसी समय तनिक उड़कर बैठ जाय तो मईया उसके बैठने का अर्थ जो मिलेगा,उसीसे पूछती रहती--कन्हैया इस आँगन मेँ आयेगा?'
◾मईया का मन मथित हो रहा है--'आज काक मेरे पूछने पर उड़कर चला ही गया। वह मुझसे रुठ गया क्या? मुझसे तो दैव ही रुठा है काक। तुम मुझसे क्योँ रुठते हो?'
🔅मईया को काक की प्रत्येक चेष्टा मेँ कोई सन्देश जान पड़ता है,किन्तु यह सन्देश समझ नहीँ पाती,यह बड़ी उलझन है। जिस-तिस से पूछती रहती है। कोई तो काक चेष्टा का अर्थ जानती होगी। कोई इसे इसके मन की बात कहेगी ?'
◾काक,खञ्जन प्रभृति अनेक पक्षी हैँ जिनकी चेष्टा, बोली, जिनके दर्शन की दशा ,स्थिति से शकुन,अशकुन देखने की प्रथा है। इनमेँ से प्रत्येक को देखकर मईया के मन मेँ एक ही बात उठती है-कन्हैया आ रहा है? वह मिलेगा मुझे ?'
🔄क्रमश:
▪[श्री राधारमणाय समर्पणम्] ▪
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